प्रश्न : मैं सुनीता हूँ, अमृतसर से। मैं 28 वर्ष की हूँ और मैं ट्यूशन पढ़ाती हूँ। पिछले कुछ समय से मेरे साथ कुछ ऐसा हो रहा है कि सारे दिन, सुबह से रात तक मन के सामने एक फिल्म सा चलता रहता है, और ये फिल्म बहुत निगेटिव होता है। उसमें बहुत ज्य़ादा अश्लील चीज़ें जैसे दिखाई देती हैं। जिससे मेरा मन बहुत बेचैन हो जाता है, अशांत हो जाता है। कुछ वर्ष पहले ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। अब ये होने लगा है। इसके लिए मुझे क्या करना चाहिए?
उत्तर : मैं अपने सभी साथियों को, भाई-बहनों, सभी दर्शकों को ये बात कहता रहता हूँ और सावधान करना चाहता हूँ कि हम कलियुग के उस पीरियड में पहुंच चुके हैं, सब जानते हैं कि ये कलियुग चल रहा है और हम सब जानते हैं कि ये एंड ऑफ कलियुग है। ये कलियुग बदलने वाला है। अब हम चलते-चलते वहाँ पहुंच गये हैं बहुत केयरफुली जानने की बात है। जहाँ हमारे अन्दर के संस्कार प्रगट होने लगे हैं, किसी ने भी जो भी बैड कर्म किए हैं, गन्दी चीज़ें की हैं, देखी हैं, सुनी हैं, जो हमारे अन्तरमन में समाई थी वो अब जगने लगी हैं। बहुतों को ये बैड फीलिंग हो रही है कि वो चाहते नहीं हैं लेकिन ऐसी चीज़ें सामने आ रही हैं। अब ये इनको पढ़ाना भी है ऐसी चीज़ें सामने आती रहेंगी तो इनकी एकाग्रता नष्ट हो जायेगी। इनका फ्यूचर भी खराब हो जायेगा। कोई स्टूडेंट इनके पास आयेगा नहीं। फिर जब मनुष्य सोता है, सोने जाता है फिर वो फिल्म ऐसे घूमने लगती है। इस फिल्म को नष्ट करने के लिए ही बहुत अच्छे राजयोग की अग्नि अपने अन्दर जलानी पड़ेगी। क्योंकि ये चीज़ें हमने भरी हैं किसी और ने नहीं। कुछ लोग भर रहे हैं अभी भी उनको बहुत पछताना पड़ता है जब उनकी दयनीय स्थिति हो जाती है ना मानसिक, बहुत पछताते हैं कि हमने अपने जीवन में ये क्या-क्या कर लिया! इसलिए मैं अपने युवक साथियों को कहूँगा कि अपने जीवन में इन सबसे बचें। अगर अपने भविष्य को सुन्दर देखना है, अगर कुछ करना है अपनी जि़ंदगी में तो इन सब गंदगी से अपना नाता तोड़ दें। इनको ये सब फीलिंग हो रही है तो इनको वही अभ्यास जो हम बता आये हैं, चर्चा कर रहे थे जब इनको ऐसी फीलिंग होने लगे तो तुरंत 21 बार याद करें मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ। अच्छी तरह तीन मिनट लगायें। मेरे से शक्तियों की किरणें फैल रही हैं। पॉवरफुल औरा बनता जा रहा है मेरे चारों ओर। इसमें जैसे ये लीन हो जायें, तल्लीन हो जायें तो बहुत जल्दी वो चीज़ समाप्त होने लगेंगी। सवेरे-शाम पाँच-पाँच स्वरूपों का पाँच-पाँच बार ये अभ्यास करें, और स्वमान का भी अभ्यास बढ़ायें। बच्चों को पढ़ाते हुए आत्मिक दृष्टि से देखें। क्या होता है जो बच्चे होते हैं उनसे भी बहुत सारी निगेटिविटी मनुष्य को आती रहती है। लोग सोचते हैं कि बच्चे तो पवित्र हैं, वो तो बहुत भोले हैं लेकिन आजकल ये स्थिति बदली हुई है। तो उनसे आने वाली निगेटिव एनर्जी, इनकी निगेटिव एनर्जी को स्टिम्युलेट(उत्तेजित) कर देती है। इसलिए ये जैसे ही बच्चों को पढ़ायें तो पहले बच्चों को आत्मा देखें और अच्छे स्वमान का अभ्यास करें और उसमें स्थित हो जायें। ताकि इनके चारों ओर एक पॉवरफुल औरा बन जाये। जो उस बैड एनर्जी को रिफ्लेक्ट करता रहे। ये इनको ज़रूर करना चाहिए और विश्वास करना चाहिए कि जल्दी समाप्त हो जायेगी। थोड़ा मेडिटेशन पर ध्यान दें, अपने लिए थोड़ा समय दें, अच्छे साहित्य का अध्ययन भी करें।
प्रश्न : सेवाकेन्द्र पर ही जाकर ये तपस्या करनी है या फिर घर में रहते हुए भी हम ये तपस्या या योग का अभ्यास करें कर सकते हैं?
उत्तर : सेवाकेन्द्र इसीलिए बनाए गए हैं क्योंकि सेवाकेन्द्र का माहौल अलग होता है और घर का माहौल अलग होता है। हर व्यक्ति जब वहाँ जाने की सोचेगा तो वो जल्दी उठेगा, नहायेगा, जल्दी तैयार होगा, अपने काम-काज पूरे करेगा, चुस्त होगा और वहाँ जायेगा तो वहाँ के वातावरण में संगठित रूप से यानी और लोग भी योग साधना कर रहे हैं उनके बीच में, वायुमंडल में मनुष्य योगाभ्यास करेगा तो उसको काफी मदद मिलेगी। दूसरा वहाँ जाना इसलिए आवश्यक है क्योंकि वहाँ ईश्वरीय महावाक्य सुनाये जाते हैं। रोज़ मनुष्य को जब सुन्दर बातें सुनने को मिलेंगी तो उनके विचार बदलेंगे, उनका चिंतन बदलेगा, एकाग्रता के बारे में उसे कई बातें मिलेंगी। मन कहाँ भटक रहा है, उसे कैसे रोका जाए, अंतर्मुखी कैसे बना जाए ये सब सीख वहाँ रोज़ मिलती है। ये ज्ञान मार्ग ऐसा है जिसमें हमें रोज़ कुछ न कुछ सीखना पड़ता है। इसलिए जो लोग रोज़ वहाँ जाते हैं उनके लिए राजयोग का मार्ग सरल हो जाता है। फिर वो घर में रहते हुए भी सारा दिन उसका अच्छा अभ्यास कर सकते हैं। अपने कत्र्तव्यों का सहज निर्वाह कर सकते हैं। जो उनकी जि़म्मेदारी है उनको फुल-फिल कर सकते हैं सहज भाव से। केवल एक ही घंटा तो देना है। सुबह उठकर अपना कामकाज सेट करके वो वहाँ जायेंगे तो सवेरे का इफेक्ट उनके पूरे दिन पर पड़ेगा, अर्थात् पूरे जीवन पर पड़ेगा। इसलिए वहाँ रोज़ जाना बहुत-बहुत आवश्यक है। अगर मनुष्य एक नियम बना ले जैसे लोग मंदिरों में जाने का नियम बना लेते हैं कि 6 बजे मुझे वहाँ जाना है। ये जो संकल्प है ये मनुष्य को चुस्त रखेगा। और मैं ये कहता हूँ एक घंटा वहाँ देने से आपकी दिनचर्या के 2 घंटे बचेंगे। ये बहुत सूक्ष्म रहस्य है। आपकी जो इनर पॉवर बढ़ेगी, आपका जो मन खुश होकर आयेगा, जो कुछ पुण्य कर्म करना सीख कर वहाँ से आयेंगे, आपके विचारों में जो चेंजेस हो जायेगी उससे आपका पारिवारिक जीवन सुखी होगा। वहाँ जाकर मनुष्यों को रियलाइज़ होता है, मेरी क्या गलती है, सम्बन्धों में यदि टकराव हो रहा है तो इसमें क्या योगदान करूँ जो इसमें टकराव न हो। तो इससे बहुत फायदे हैं। जो रोज़ ऐसी तपस्या कर रहे हैं उन्हें रोज़ ब्रह्ममुहूर्त में एक घंटे बहुत अच्छी साधना करनी चाहिए। एक घंटा सवेरे, ऐसे ही एक घंटा शाम को। क्योंकि शाम का समय भी बहुत सुन्दर होता है, जब मनुष्य का मन शांत होता है। तो दो घंटे बैठना, बाकी दो घंटे कर्म में करते रहना चाहिए। कभी अशरीरी होने का अभ्यास, कभी मैं एक महान आत्मा हूँ ये अभ्यास, पांच स्वरूप का अभ्यास, हमारे बहुत सारे अभ्यास हैं, जो हम सुनाते ही रहते हैं। तो चार घंटे हँसते-बहलते होगा। रात को सोते समय 15-20 मिनट फिर निकालें। जिसमें सारा दिन जो कुछ हुआ उसको भुला देना है और मन पर एक सुन्दर छाप छोड़कर परमात्म मिलन की, स्वमान की, फिर सोना है।





