जिन्होंने निरुत्साही को उमंग-उत्साह दिया, भटके हुए को राह दिखाई, कमज़ोरों को सहारा दिया, भूले हुए को क्षमा किया, हारे हुए को आगे बढ़ाने के लिए पे्रात्साहित किया ऐसे जीवन भर में हरेक को दिया है, अंधकार के फँसे हुए को प्रकाश दिया- ऐसे देते-देते- वे देवतुल्य बन गए, विकारों पर विजय प्राप्त कर ली उनका दीपोत्सव।
दीपावली जगमगाते हुए दीपों की रोशनी का त्योहार है तो आइए इस बार एक नई सोच के साथ एक नई तरह से दीपावली मनाएं। इस पर्व के हर एक रीति-रिवाज़ के पीछे के आध्यात्मिक रहस्य को गहराई से जानें तथा अपने जीवन को एक नई सोच और एक नई दिशा दें।
इस नए साल पर नए युग के आगमन का शुभारम्भ करें। अपने यथार्थ अस्तित्व को जानकर परमपिता परमात्मा से जुड़कर अपना आत्मा रूपी दीया जलाएं। और हर एक को स्नेह भरी शुभकामनाओं और शुभभावनाओं रूपी अमूल्य गिफ्ट दें। इस दीपावली स्वास्तिक बनाते हुए उसकी चारों भुजाओं के द्वारा इस धरा के चारों युगों को जानें। साथ ही दीपावली के स्वादिष्ट क्रदिलखुश मिठाई’ का स्वाद स्वयं भी चखें और औरों को भी बांटे। भाईदूज के तिलक के महत्व को जानकर सदा ही अपनी आत्मिक स्मृति का तिलक हर दिन अपने मस्तक पर सजाएं।
इसके साथ ही दीपावली पर हर साल नई चीज़ों की खरीदारी करते आये हैं। इस बार उन चीज़ों के साथ नए संस्कार भी अपने जीवन में धारण कर नवीनता लाएं जिससे आपके मन में और जीवन में खुशहाली छा जाए। और अत: यह सब अपने जीवन में धारण करने से अपने जीवन के सभी बही-खाते को सही तरीके से सेटल कर पाएंगे।
दीया के महत्व को जानें
दीपावली माना ‘दीपों का त्योहार’। जिसे दीपमाला भी कहते हैं, जिसका अर्थ है ‘एक दीये से दूसरे दीये को जलाना माना ज्योति से ज्योति जगाना’। हम सभी ने अपने-अपने घर में यह सुना होगा, देखा होगा कि घरों में जलने वाले दीये की लौ कभी भी बुझ न पाए वर्ना अशुभ होगा, यह हमेशा जलती रहे, प्रज्वलित रहे। तो जीवन में सबकुछ शुभ ही शुभ होगा। लेकिन क्या कभी हमने इसमें छीपे रियल अर्थ को जानने और समझने की कोशिश की है कि कैसे एक दीये की लौ से जीवन में शुभ या अशुभ हो सकता है! दीपावली पर्व के सन्देश द्वारा दीये/दीपक के रियल स्वरूप को समझते हैं…
दीया/दीपक- मिट्टी का दीया माना मिट्टी का शरीर और उसमें आत्मा रूपी बत्ती को जलाने के लिए घी या तेल के रूप में परमात्मा का ज्ञान चाहिए, जिससे वो आत्मा हमेशा जागृत रहेगी और अपने प्यार, शान्ति और खुशी के ओरिज़नल संस्कारों से अपने आस-पास की आत्माओं को भी जागृत कर देगी। इसलिए जब भी जीवन में कोई तूफान आए और हमारे दीये की लौ थोड़ा टिमटिमाने लगे तो हमें तुरन्त कुछ क्षण रूककर परमात्मा की याद में उनके ज्ञान का घी डालकर अपनी लौ को वापस तेज कर देना है।
नये साल, नये युग की नयी शुरुआत
भारत के कुछ क्षेत्रों में दीपावली का पर्व नये साल के रूप में भी मनाया जाता है। तो जब हम अपने रियल अस्तित्व को जान जाते हैं, आत्मा जागृत हो जाती है तो हमें, सभी को नये साल के साथ-साथ नये युग की दुआएं या शुभकामनाएं देनी चाहिए, क्योंकि ऐसे ही हम इस सृष्टि पर सतयुग ला सकते हैं, क्योंकि हम मन और बुद्धि से सबको देने वाली आत्माएं हैं जिससे सभी के संस्कार बदल जाएंगे और सृष्टि पर एक नया सतयुगी सवेरा आयेगा।
स्वास्तिक क्यों बनाते हैं…– दीपावली पर्व या अन्य पूजन की शुभ शुरुआत करते हुए बनाए जाने वाले क्रस्वास्तिक चिन्हञ्ज के आध्यात्मिक महत्व को समझते हैं। हम सभी दीपावली के दिन स्वास्तिक बनाते हैं और श्रीलक्ष्मी जी का आह्वान करते और गणेश-लक्ष्मी का पूजन करते हैं।

स्वास्तिक चिन्ह का रियल अर्थ – स्वास्तिक का सही आध्यात्मिक अर्थ है अस्तित्व, जोकि आत्मा की यात्रा को दर्शाता है। स्वास्तिक की चार भुजाएं चार युगों के बारे में बताती हैं कि पहले आत्मा कहाँ थी, अभी कहाँ है और आगे कहाँ जाना है? तो अगर हम देखें तो स्वास्तिक का पहला भाग एक होरिजेंटल लाइन है जोकि देने का भाव दर्शाती है। जैसे हाथ देने की मुद्रा में होते हैं। ये सतयुग को दर्शाता है जिसे हम स्वर्ग, पैराडाइज़, जन्नत, बहिश्त आदि नामों से भी जानते हैं। इस युग में सभी आत्माएं भरपूर थीं, उनकी ज्योति जगी हुई थी, वह सबको दुआएं देने वाली थीं।
सतयुग के बाद आता है त्रेतायुग, जिसमें स्वास्तिक की रेखा नीचे की ओर जाती है जिसका अर्थ है, आत्मा की शक्ति थोड़ी-थोड़ी कम होना शुरू हो गई है।
उसके बाद द्वापरयुग में स्वास्तिक की रेखा का हाथ जैसे मांगने की मुद्रा में आ जाता है, जिसमें आत्मा भूल गई कि वो भरपूर है। वह जो सबको देने वाली आत्मा थी, अब उसने दूसरों से मांगना शुरू कर दिया है।
और आखिर में कलियुग माना, जब मांगने के बाद भी नहीं मिला तो, स्वास्तिक का हाथ ऊपर की ओर चला जाता है। यानी मारने की मुद्रा में आ जाता है, तब शुरू होता है क्लह-क्लेश का युग।
इस तरह से हमने स्वास्तिक के सही अर्थ को समझा। जैसा कि हम सभी जानते हैं कि, आज घोर कलियुग का, अंधकार का समय चल रहा है जिसके बाद सतयुगी सवेरा आना ही है।




