आप सब पाण्डव पति के प्यारे पाण्डव हो जिन्होंने अपने आपको इस संगम पर एक बाबा, एक बाबा की सेवा में बलिहार किया है। इन संगम की महा घडिय़ों में अथक सेवाधारी बन डबल कमाई कर रहे हो। बन्धनमुक्त, जीवनमुक्त के अतिन्द्रिय सुख का मजा इन घडिय़ों में प्राप्त कर रहे हो। क्योंकि आप सभी ने अपने दिलतख्त पर एक बाबा को बिठाया है। बाबा भी कहता- मेरा दिलतख्त तुम बच्चों के लिए है। यह बन्धनमुक्त समर्पित जीवन भी बहुत बड़ी तकदीर है। आप देह और देह के सभी सम्बन्धों को छोड़ बाबा की अलौकिक सेवा में अपना तन-मन-धन, जीवन सफल कर रहे हो। यह श्वास भी बाबा की है तो संकल्प भी बाबा के हैं। बाबा के सिवाए इन आँखों में दूसरा कोई बसता ही नहीं।
ड्रामा अनुसार संगम पर बाबा ने शिवशक्तियों को ज्ञान का कलश दे सेवाकेन्द्रों पर निमित्त रखा है। लेकिन आप सबकी यह महान तकदीर है जो आपने अपने आपको विश्व कल्याण की सेवा में अर्पित किया। ड्रामा अनुसार आपको यह महान भाग्य मिला है। उन प्रवृत्ति वालों को लौकिक बंधनों को निभाते अलौकिक सम्बन्ध में आने का पार्ट है। हज़ारों में विरले ही कोई-कोई को यह लॉटरी मिलती है। आप सबको स्पेशल निमंत्रण दे बुलाया है। इसलिए आप लोगों के भाग्य का हम क्या गुण गायें! आप डबल सेवाधारी, त्यागी तपस्वी हो।
आप सब इस अलौकिक भट्टी में आये हो- भट्टी का अर्थ ही है- अन्तर्मुख हो जाना। आप सब यहाँ विशेष 3-4 बातों के लिए आये हो। 1. आप बेहद सेवायें करके आये हो, उन सेवाओं से भी परे बाबा आप सभी को अपनी गोदी में विश्राम देगा। सेवायें तो बहुत करते, अब यहाँ आये हो तो बाबा की शीतल छाया में, यादों में खो जाना।
बाबा की हर मुरली में जो योग का मंत्र आता, उसी योग की बहुत गहरी, स्वीट साइलेन्स की बहुत सूक्ष्म शक्ति की अनुभूति करना। उसी योग के चार्ट को सम्पन्न करना। खास योग की अपने में इतनी शक्ति भरकर जाना जो वह याद की शक्ति सेवा में रहते ऑटोमेटिकली अपनी ओर खींचती रहे। इसके लिए जो भी कोई सूक्ष्म चिंतन हो, परचिंतन हो, दिल के अन्दर सूक्ष्म में संस्कार हो, स्वभाव हो, वृत्तियों में कोई विकल्प हो, इसी घड़ी से उसको ऐसे भूल जाओ जैसे वह मेरे थे ही नहीं। आप समझो हम संसार की न्यूज़ से परे, सब संकल्प-विकल्पों से परे अन्तर्मुखता की गुफा में आये हैं। अन्तर्मुखी तपस्वीमूर्त बन जाना है। यही हमारी अन्त मति सो गति है। इसी की हम सबको दरकार है, यही हमारी तपस्या है, याद है जो हमें विकर्माजीत बनाएगी। इसके लिए एकदम आवाज़ से परे, मन्सा के संकल्पों से भी परे रहना। ऐसा समझो हम बाबा की याद के व्रत में हैं, मौन में हैं। न मुख का बोल, न मन का बोल, न आवाज़ सुनना, न आवाज़ में आना। जब ऐसे अन्तर्मुखी हो जाएंगे तो चमकते हुए सितारे दिखाई देंगे। चमकती हुई मूर्त बन जाएंगे।
याद की भट्टी का मज़ा लेने के लिए कम्पलीट मौन में रहना है, याद के व्रत में रहना है, निंद्राजीत बनना है। ज्ञान के मनन-चिंतन से, योग की शक्तियाँ भरपूर करनी हैं। हर कदम में शक्ति रूप बनना है। सदा अपने स्वमान की स्टेज में स्थित रहना है। क्योंकि जीवन में हँसना, खेलना, बहलना तो होता ही रहता है परन्तु अभी जो बाबा लास्ट स्टेज बार-बार कहता, वह है ही याद के यात्रा की। इसलिए हमें यादों में समाना है और समाकर शक्ति भर जाना है।




