एक कुम्हार रोज़ मिट्टी के दीपक बनाता था, पर उसका बेटा हमेशा शिकायत करता कि ”हम छोटे लोग हैं, हमारे दीपक की कोई कीमत नहीं।” कुम्हार ने मुस्कुराकर कहा, ”समय आने पर पता चलेगा।”
दीवाली आई, बाज़ार रंग-बिरंगा हो गया। बेटा हैरान था लोग बड़े-बड़े सजावटी सामान खरीद रहे थे, लेकिन शाम होने पर सबके हाथ में केवल साधारण मिट्टी के दीपक थे। कुम्हार बोला, ”देखा? अंधेरा मिटाने के लिए दुनिया को बड़ी-बड़ी चीज़ों की नहीं, छोटे से दीपक की रोशनी की ज़रूरत होती है।”
बेटे के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसे समझ आया कि किसी की कीमत उसके आकार, रूप या स्थिति से नहीं, बल्कि उसके काम और उद्देश्य से तय होती है।
शिक्षा : हम चाहे छोटे हों, साधारण हों, लेकिन सही समय पर हमारी रोशनी दुनिया बदल सकती है।




