एक मूर्तिकार था जो पत्थरों से सुंदर मूर्तियां बनाता था। उसका शिष्य हमेशा पूछता – ”गुरू जी, आप कैसे जानते हैं कि इस पत्थर के अंदर कौन सी मूर्ति छिपी है?” मूर्तिकार हँसकर कहता – ”मैं मूर्ति नहीं बनाता, मैं सिर्फ अनावश्यक हिस्से हटाता हूँ, पहली से ही मूर्ति पत्थर में मौजूद होती है।”
एक दिन शिष्य ने अपनी पहली मूर्ति बनानी शुरू की। उसने कई बार गलतियां की, मूर्ति टूट गई, आकार बिगड़ गया। वह निराश होकर बोला – ”मुझसे नहीं होगा।”
गुरु जी ने उसे शांत होकर कहा – ”जिस तरह मैं पत्थर में छिपी मूर्ति को बाहर लाता हूँ, उसी तरह मेहनत तुम्हारे भीतर छिपी क्षमता को बाहर लाएगी। लेकिन उसके लिए तुम्हें अपने डर, आलस और शंकाओं को हटाना होगा।”
शिष्य ने हिम्मत नहीं छोड़ी और काम जारी रखा। कुछ समय बाद उसने अपनी पहली सुंदर मूर्ति बना ली।
गुरु जी बोले – ”हम सबके भीतर प्रतिभा छिपी होती है, बस उसे बाहर आने का साहस चाहिए।”
शिक्षा : विकास बाहर से नहीं, अंदर से शुरू होता है।




