मनुष्य का सच्चा लक्ष्य केवल स्वयं खुश रहना नहीं, बल्कि अपने व्यवहार, वाणी और दृष्टि से सभी को सुख देना है। जब आत्मा दिनभर प्रसन्न रहती है, धैर्य रखती है और शान्ति से व्यवहार करती है, तभी जीवन-यात्रा संघर्ष से समाधान की ओर, अशान्ति से शान्ति की ओर बढ़ती है। परमात्मा ने इस कलियुग के संगमयुग में हमें कुछ अमूल्य स्वमान दिए हैं, जिनमें से चार को चुनकर यदि हम जीवन में धारण कर लें, तो हमारी स्थिति स्थिर, शान्त और कल्याणकारी बनी रहती है।
1. देह-अभिमान छोड़ आत्म-अभिमानी बनो – पहला स्वमान है—”मैं आत्मा हूँ”। जब हम स्वयं को शरीर नहीं, बल्कि शान्ति, प्रेम और शक्ति से भरपूर आत्मा समझते हैं, तो व्यवहार में सहजता आ जाती है। क्रोध, चिड़चिड़ापन और अधीनता कम हो जाती है। जैसे कोई कठोर शब्द बोले, तो आत्म-अभिमानी व्यक्ति तुरंत प्रतिक्रिया नहीं करता, बल्कि शान्त रहकर स्थिति को संभाल लेता है।
2. हर परिस्थिति में शान्त रहने का अभ्यास – परमात्मा ने हमें सिखाया है कि शान्ति हमारा स्वभाव है। बाहरी परिस्थतियाँ कैसी भी हों, भीतर शान्ति बनाए रखना ही सच्ची जीत है। जैसे परिवार या कार्य-स्थल पर तनाव हो, तब शान्त चित्त से बोलना और सुनना वातावरण को भी शान्त कर देता है। यही शान्ति दूसरों को सुख देने का माध्यम बनती है।
3. सहनशीलता और धैर्य(पेशन्स) को शक्ति बनाओ – धैर्य कमज़ोरी नहीं, बल्कि आत्मा की महान शक्ति है। परमात्मा का यह सुमन हमें सिखाता है कि समय आने पर हर समस्या का समाधान स्वत: निकल आता है। जैसे तुरंत फल न मिलने पर निराश होने के बजाय धैर्य रखना, मन को स्थिर और प्रसन्न रखना है।
4. सेवा की भावना—सबको सुख देने का संकल्प – परमात्मा ने हमें सबसे सुन्दर सुमन दिया है—”जो मिला है, उसे बाँटो।” जब हमारा लक्ष्य सबको सुख देना बन जाता है, तब जीवन की यात्रा सहज और पवित्र हो जाती है। जैसे मीठी वाणी, शुभ भावना और स्नेहपूर्ण दृष्टि—ये छोटी-छोटी सेवाएँ भी सामने वाले के जीवन में शान्ति भर देती हैं।
इन चार स्वमानों— आत्म-अभिमान, शान्ति, धैर्य और सेवा को यदि हम अपना चुनाव बना लें, तो हमारी यात्रा अशान्ति से शान्ति की ओर, दु:ख से सुख की ओर निरंतर आगे बढ़ती रहेगी। यही परमात्मा का सच्चा उपहार है, जिससे हमारी स्थिति भी श्रेष्ठ रहती है और दूसरों को भी सुख मिलता है।




