दादी गुलज़ार केवल एक महान व्यक्तित्व ही नहीं, बल्कि परमात्मा शिव की ट्रांस मैसेंजर थीं। जिनके माध्यम से असंइय आत्माओं ने परमात्मा से मिलन और शक्ति का अनुभव किया। पूर्ण समर्पण, अटूट निश्चय ‘मेरा कुछ भी नहीं, सब बाबा करवा रहा है’ का भाव उनका जीवन मंत्र था। ऐसी दिव्य आत्मा का जीवन ईश्वरीय सेवा की साकार प्रेरणा है।
ब्रह्माकुमारीज़ संस्थान की अमूल्य धरोहर, दादी हृदयमोहिनी जी, जिन्हें सम्पूर्ण विश्व दादी गुलज़ार के नाम से जानता है, उनकी पुण्यतिथि के पावन अवसर पर उनका जीवन हमारे लिए एक जीवंत पाठशाला है। दादी जी केवल एक व्यक्तित्व नहीं थीं, बल्कि दिव्यता, समर्पण और परमात्म-निष्ठा की साकार प्रतिमूॢत थीं। उनके जीवन को यदि 6 मुख्य ङ्क्षबदुओं में समझा जाए, तो ये 6 गुण हर किसी के लिए मार्गदर्शक बन सकते हैं और वे भी उन जैसा जीवन बना सकते हैं।
1. दिव्यता(डिविनिटी) – दादी गुलज़ार जी के जीवन का मूल आधार दिव्यता थी। उनके चेहरे की मुस्कान, दृष्टि की पवित्रता और वाणी की मधुरता से सहज ही ईश्वरीय अनुभूति होती थी। वे बोलती कम थीं, परन्तु उनकी उपस्थिति ही आत्माओं को शान्ति और शक्ति प्रदान कर देती थी। यह दिव्यता किसी बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि निरंतर परमात्म-स्मृति और पवित्र जीवनशैली से प्रकट हुई थी।
2. पूर्ण समर्पण(डेडिकेशन) – दादी जी का जीवन पूर्ण रूप से ईश्वरीय सेवा के लिए समॢपत था। उन्होंने तन, मन, धन और समय, सब कुछ परमात्म कार्य में अर्पण कर दिया था। व्यक्तिगत इच्छा, पसंद-नापसंद उनके जीवन में कोई स्थान नहीं रखती थी। वे सदा यही अनुभव कराती थीं कि ”यह मेरा जीवन नहीं, बाबा का है।” यही पूर्ण समर्पण उन्हें परमात्मा का सशक्त माध्यम बनाता था।
3. अडिग रहना(डिटर्मिनेशन) – दादी गुलज़ार जी के भीतर अद्भुत दृढ़ संकल्प था। चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, उनके निश्चय में कभी डगमगाहट नहीं आई। ईश्वरीय मर्यादाओं और बाबा की आज्ञा पर चलने में वे सदैव अटल रहीं। यही डिटर्मिनेशन उन्हें हर चुनौती में विजयी बनाता रहा और संस्थान को स्थिरता और शक्ति देता रहा।
4.’मेरा कुछ भी नहीं’ का भाव – दादी जी का सबसे सुंदर और गहरा गुण था—निर्ममत्व नहीं, बल्कि निर्मम भाव। उनका स्पष्ट अनुभव था – ”मेरा कुछ भी नहीं, सब कुछ बाबा करवा रहा है।” इस भाव ने उन्हें अहंकार से सदा मुक्त रखा। वे स्वयं को कर्ता नहीं, बल्कि निमित्त मानती थीं। इसी कारण उनके माध्यम से परमात्मा सहज रूप से कार्य कर पाते थे।
5. परमात्मा पर पूर्ण भरोसा – दादी जी का हर कदम, हर निर्णय परमात्मा के भरोसे पर आधारित था। उन्हें भविष्य की चिंता नहीं थी, क्योंकि उन्हें यह निश्चय था कि जो कराने वाला है, वही संभालने वाला भी है। यह अटूट विश्वास उनके चेहरे की सदा बनी रहने वाली शान्ति का रहस्य था।
6. सहनशीलता और हृदयमय स्वरूप (हृदयमोहिनी) – असीम सहनशीलता के कारण ही उन्हें हृदयमोहिनी कहा गया। परिस्थितियाँ, आलोचनाएँ या सेवा की कठिनाइयाँ—सब कुछ वे मुस्कान के साथ सहन कर लेती थीं। उनका हृदय विशाल था, जिसमें सभी के लिए स्थान था। वे हर आत्मा को अपनापन और सुरक्षा का अनुभव कराती थीं।
इन छ: गुणों के कारण दादी गुलज़ार जी केवल एक ट्रांस मैसेंजर नहीं, बल्कि एक जीवित उदाहरण बनीं कि कैसे आत्मा स्वयं को शून्य बनाकर परमात्मा को प्रकट करती है। उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर हम यही संकल्प करें कि इन छ: गुणों को अपने जीवन में धारण कर, हम भी सच्चे अर्थों में बाबा के निमित्त बनें—यही दादी जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।



