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कर्म बंधनों से मुक्त रहने का सहज तरीका

कर्मबंधन की बैलेन्स शीट को शून्य करने के लिए बाबा ने फॉर्मूला बताया कि 0 = 0 यानी कि हम जो भी सोचें, करें, कहें, देखें उसमें आत्मा, बिन्दु स्वरूप होकर करें, तब कर्म का परिणाम भी ज़ीरो होगा। अगर हमारी सोच, कर्म, देखना दोष-युक्त होगा तो उसका परिणाम ज़ीरो तो नहीं होगा ना! इसीलिए बाबा कहते हैं आत्मिक स्मृति में रहकर दूसरे को आत्मा बिन्दु देखो, तभी परिणाम ज़ीरो होगा।

ईश्वरीय परिवार के अन्दर ही हमारा एक-दूसरे से कार्मिक सम्बन्ध जुड़ता है। इसलिए हमें कर्मयोगी ये परिवार बनाता है। बाकी अगर परिवार न हो और खाली ईश्वर से ही ह्रश्वयार हो तो वो तो दुनिया में भी कहीं हैं। लेकिन बाबा ने हम बच्चों को एक ऐसे मीठे सम्बन्ध में बांधा कि ये बेहद का परिवार, बेहद के बाप का परिवार, ये हमारा परिवार है। इसलिए हम ये साधारण रीति से कर्मयोगी बनने लगते हैं।

आज अगर दुनिया के अन्दर देखें तो मनुष्य के कर्म बंधन बनते जा रहे हैं और उसको बोझ का अनुभव करा रहा है। अनेक प्रकार के बोझ से बोझिल होते जा रहे हैं। ये बंधन कैसे बनता है ये भी हमें पता चल गया। तो जितना व्यक्ति देह अभिमान, देह अहंकार या देह भान के वशीभूत होकर कर्म करता है उतना ही ये बंधन बनता जाता है। दूसरा- जितना व्यक्ति के अन्दर स्वार्थ भाव प्रकट होता है या जिसको कहा जाता है सेल्फ सेंटर्ड व्यक्ति होने लगता है उतना वो बंधन क्रियेट करता है। तीसरा- जब कर्मेन्द्रिय की अधीनता आ जाती है, गुलाम हो जाते हैं इन्द्रियों के और आसक्ति वश कर्म करते हैं तो ये कर्म बंधन बनता है। चौथी बात- जब दोष दृष्टि, वृत्ति होती है तब हमारे कर्म बन्धन बनते हैं।

दोष दृष्टि, वृत्ति यानी जिसको भी देखते हैं हर इंसान के अन्दर विशेषता भी है तो कमज़ोरियां भी हैं। हरेक के अन्दर अच्छाई भी है, बुराई भी है लेकिन जब हमारी दृष्टि, वृत्ति के अन्दर दोष प्रकट होने लगते हैं कि ये व्यक्ति ऐसा है, ये व्यक्ति ऐसा करता है, उसके दोष की तरफ ही हमारी दृष्टि और वृत्ति हमेशा जाती रहे, ये कर्मबंधन क्रिएट करता है। तो कर्मबंधन अनेक बना दिए हमने। विकारों के वशीभूत होकर तो कर्म करना ये बंधन क्रिएट करता ही है। लेकिन ये सब बातें भी सूक्ष्म में हमारे बंधन क्रिएट करती गई। अब उससे मुक्त होकर हमें कर्मयोगी बनना है। तो उसकी विधि क्या है? जो कहा देह अभिमान, देह भान और देह अहंकार को खत्म करने की जो बाबा ने बताई कि बच्चे तुम आत्मा हो ये देह नहीं हो। और ये जागृति आते ही आत्म स्थिति, आत्म मनोस्थिति जितनी हमारी बनती गई आत्मिक भाव हमारा जितना डेवलप होता गया, विकसित होता गया तो हरेक को आत्मिक दृष्टि से हमने देखना आरंभ किया। तो धीरे-धीरे वो दोष दृष्टि परिवर्तन हो गई। और विशेषता भी नज़र आने लगी कि हाँ इसमें ये भी अच्छाई है, ये भी अच्छाई है।

तो इसीलिए हमारी जब ये दृष्टि, वृत्ति परिवर्तन हुई तो देही अभिमानी बनना हमारे लिए आसान हो गया। देही अभिमानी माना आत्मा के सातों गुणों के स्वरूप बनकर उसमें स्थित होकर कर्म करना। आत्मअभिमानी या देहीअभिमानी उसको नहीं कहा जाता कि हम रटते रहें कि मैं आत्मा हूँ, मैं आत्मा हूँ। रटने का नहीं है लेकिन उसका स्वरूप बनना है और स्वरूप बनने का मतलब है कि आत्मा के सातों गुण उसकी ऊर्जा नैचुरल रूप में हमारी इंद्रियों के द्वारा हर कर्म में प्रवाहित होने लगे।

सहजता से, शांति से, प्रेम से, सुख स्वरूप होकर दूसरों को भी सुख देने के भाव से जब ये ऊर्जा हमारे हर कर्म में प्रवाहित होने लगती है तो तब कहा जाता है कि हाँ देही अभिमानी होकर हम कर्म कर रहे हैं। तो वहाँ वो मैंपन देहअभिमान वाला धीरे-धीरे क्षीण होने लगता है और आत्मस्थिति हमारी पॉवरफुल होने लगती है, मजबूत होने लगती है।

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