मुख पृष्ठदादी जीदादी जानकी जीजो संतुष्ट हैं वे ही बाबा के कार्य में मददगार बनते

जो संतुष्ट हैं वे ही बाबा के कार्य में मददगार बनते

फालतू व्यर्थ ख्याल आपेही नहीं आते, इसे हम स्वयं पैदा करते हैं। एक व्यर्थ आया तो औरों को साथ ले आता है, जो सारी शक्ति छीन लेता है। बाबा से कनेक्शन टूट जाता है। फिर मुख से बाबा-बाबा भी नहीं कहते हैं, इतना तो माया गला घोट देती है इसलिए बाबा कहते हैं- खबरदार रहो। वाह बाबा! वाह ड्रामा! वाह रे मैं! ऐसा सच्चा पुरुषार्थ, तीव्र पुरुषार्थ, कन्टीन्यु होता रहे, अपनी स्थिति ऊंची एकरस बनाना – यह भी एक शान है। सदा साथ का अनुभव बहुत सुखी रखता है। वो फिर सदा अन्तर्मुखी रहता है। अगर मैं यहाँ सन्तुष्ट रहकर सबको सन्तुष्ट नहीं कर सकती हूँ, तो मैं बाबा की मददगार नहीं हूँ। सेंसिटिव नेचर वाला कभी सुखी नहीं रह सकता है, न ही कभी किसी को सुख देके सन्तुष्ट कर सकता है। तो सेन्सीबुल बन अपनी नेचर को बड़ा मीठा बनाओ। अपनी धारणा में मजबूत रहो जिससे कोई हमसे डिस्टर्ब न हो, न मैं कभी किसी से डिस्टर्ब हो जाऊं।

स्व-चिंतन और ईश्वरीय चिंतन में रहो। जैसा कर्म हम करते हैं और भी देखके वही करते हैं। तो जितना ज्ञान अति सूक्ष्म है, उतनी सूक्ष्म चेकिंग और चेंजिंग चाहिए। चेक किया चेंज हो गये, ऐसा ज्ञान कहता है। ज्ञान जो मिला वो जीवन में आया तो बाबा कहता है वाह बच्चे वाह! वाह ड्रामा वाह! अच्छा।

अन्दर कोई भी लीकेज है तो योग लग नहीं सकता। शक्ति मिल नहीं सकती। आत्मा, परमात्म शक्ति खींचती रहे उसी आधार से आत्मा प्रकृति को चलाती रहेे क्योंकि आत्मा और शरीर दोनों को सतोप्रधान बनाना है। तो जैसे हमारा बाबा है, वैसे हमको करना है। किसी को देखकर कुछ नहीं करने का है। जो बाबा ने किया है वही करना है। ऐसा हमको बाबा का सपूत, लाडला, सिकीलधा बच्चा बनना है। जिसको जैसा बनना है वैसा ही चिंतन करना है। सारा दिन अपने चिंतन और भावना को देखो, दृष्टि में देखो एक बाबा ही बसता है! जैसे चित्रकार की बुद्धि में एक्यूरेट मूॢत बनाने का रहता, वैसे बाबा हमारी मूॢत बना रहा है। हर बात में फॉरगिव करना, फॉरगेट करना यह पुण्य कर्म है। किसी की कमी को अपने अन्दर रखेंगे तो हमारे अन्दर क्या चलता है वो स्पष्ट दिखाई देगा। लेकिन सच्चा पुरुषार्थी जो होता है वे अपनी कमी को निकालने की कोशिश करेगा, उसका वर्णन नहीं करेगा। दे दान छूटे ग्रहण। जिसमें जो कमी हो वो ग्रहचारी दूर हो जाये। अपनी स्थिति में कोई विघ्न न पड़े। कोई मनमत पर चलता है, कुछ भी करता है… तो भी बाबा कभी यह नहीं कहेगा कि इसको यह सजा मिलनी चाहिए। वो माता, पिता, टीचर, सखा का पार्ट बजाता है। सतगुरू रूप से श्रीमत व डायरेक्शन भी देता है और सच्चा बच्चा, अच्छा बच्चा भी कहता है। अगर कोई भूल करके छिपाता है तो भी बाबा समझाएगा पर यह कभी नहीं कहेगा इसको सजा मिले। बाबा कहेगा यह मेरा काम नहीं है। माँ का काम, बाप का काम, शिक्षक का काम, सतगुरू का काम करता है, पर हर एक के कर्म के हिसाब-किताब में खुद नहीं जाता है। अपने को फ्री रखता है। शिवबाबा तो समय पर आके अपना पार्ट बजाके जाता है। बच्चों को नॉलेज देता है जो जितनी धारणा करते हैं वो उतना सुधर जाते हैं। हाँ, याद करते हैं तो उनके पाप नाश होते हैं। कर्मों की गुह्यगति समझाते हैं, परन्तु अच्छी तरह से ध्यान रखो कि ऐसा कोई भी काम नहीं करना जिससे सजा खानी पड़े। ध्यान से जो अमृतवेला करता है, मुरली सुनता है, बाबा उसमें बल भरता है।

याद माना क्या? हमको एक बाबा के सिवाए और कुछ याद न आये, हमारी याद ऐसी हो जो अवस्था परिपक्व हो। बाबा को याद करने से अवस्था मजबूत होती है। बात खत्म हो जाती है। चिंतन चलता ही नहीं है।

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