अगर हम दूसरों के गुस्से के संस्कार को देेखते रहेंगे और हम कहेंगे कि वो गुस्सा करते हैं- तो इससे सिर्फ उनका संस्कार नहीं बढ़ता, गुस्से का चिंतन कर-कर के हमारा भी संस्कार बढ़ जाता है। सबसे पहली चीज़ कि दूसरों के संस्कारों को कभी गलत नहीं कहना। दूसरी चीज़ कि उनके संस्कार का अपने मन में चिंतन नहीं करना। और तीसरी चीज़, आत्मा पर चिंतन करना और सकारात्मक ऊर्जा प्रेषित करना। यानी दुआएं देना। हम दूर-दूर जाते हैं संत-महात्माओं के पास कि हमें आशीर्वाद दो, लेकिन हम खुद सारा दिन एक-दूसरे को क्या दे रहे हैं?
आपका हर विचार, हर शब्द ब्लेसिंग हो सकता है। लेकिन अगर ध्यान नहीं रखा तो हमारे विचार और शब्द दूसरों के लिए आशीर्वाद का विपरीत भी बन जाते हैं। और ऐसा करते-करते हमारे लिए निगेटिव सोचना आदत बन जाता है। पहली बात तो यह कि किसी का संस्कार गलत नहीं है। वो हमारे से अलग है। अपने नज़रिए से वो बिल्कुल सही हैं। हमें उनके अंदर जो संस्कार उभारना है, वही सोचना है। वो संस्कार उनके अंदर उभर आएगा।
अपेक्षा रखने का मतलब है ये चाहना कि लोग वो करें, जो मुझे सही लगता है। हम लोगों से अपेक्षाएं भी रखते हैं तो अपनी क्षमता से रखते हैं। जबकि अगर अपेक्षा रखनी है तो उनकी क्षमता से रखनी होगी। अगर किसी को खाना बनाना अच्छा लगता है और बहुत अच्छा खाना बनाने की उनकी क्षमता है और मैं उनके घर चली गई, तो मैंने तो उनसे नहीं बोला था पांच पकवान बनाने के लिए। उन्होंने अपनी क्षमता से बनाए। हमने खाया, बहुत मजा आया। अगले हफ्ते वो मेरे घर आए। तो मैंने कहा, चाय तो पीकर आए होंगे, 6 बज गए हैं। फिर तो खाने में कोई रुचि लेंगे ही नहीं। जब उन्होंने पांच चीज़ें बनाई थीं तो अपनी क्षमता से बनाई थीं, लेकिन अगर उन्होंने ये अपेक्षा रखी कि जब वो मेरे घर आएंगे तो मैं भी उतनी ही चीज़ें बनाऊंगी और नहीं बनाई, तो वो हर्ट हो जाएंगे। कहेंगे, इन्होंने मेरी बेइज्जती की, मेरे लिए कुछ बनाया ही नहीं।
सारा दिन हम जो कर्म करते हैं, अपने संस्कारों के द्वारा करते हैं। अपनी क्षमताओं के माध्यम से करते हैं। लेकिन हम ये अपेक्षा रखते हैं कि दूसरे के अंदर भी ऐसा ही संस्कार होगा, और अगर नहीं होता है तो हम हर्ट हो जाते हैं। और इससे भी जरूरी यह है कि इस फेर में हम अगली बार अपना संस्कार भी छोड़ देते हैं। ये कलियुग इसीलिए बना है ऐसा। किसी एक ने गुस्सा किया होगा पहली बार तब दूसरे ने कहा इसने मेरे साथ ऐसे बात की, मैं भी ऐसे ही बात करुंगा। तो दूसरे ने किया। उन दोनों ने किया तो उनको देखकर पांच ने किया। पांच ने किया फिर पांच सौ ने किया। आज यह स्थिति है कि गुस्सा करना नॉर्मल लगता है।
ये अपेक्षा न करें कि जो मेरी विशेषता है, वो दूसरे में भी हो। अपनी विशेषता नहीं छोडऩी है। लेकिन अगर हम दूसरों को देख-देखकर अपनी विशेषताएं छोड़ते जाएंगे तो क्या होगा? आजकल कौन टाइम पर आता है, मुझे भी टाइम पर नहीं जाना। आजकल कौन सच बोलता है, क्या जरूरत है सच बोलने की? नैतिक होने से क्या फायदा, आजकल तो बहुत कुछ चल रहा है? यही दूसरों को देख-देखकर अपनी विशेषताएं छोड़ते जाना है।
ब्र.कु. शिवानी बहन,जीवन प्रबंधन विशेषज्ञा



