योग का वास्तविक परिणाम यह है कि हमारी सोच और हमारे कर्मों में शुद्धता आने लगती है। जब योग हमारे जीवन में गहराई से उतरता है, तो कर्मों से लालच, हिंसा और नकारात्मक भावनाएं स्वत: समाप्त होने लगती हैं। इसके साथ ही हमें न केवल उत्तम स्वास्थ्य का लाभ मिलता है, बल्कि सामाजिक सहयोग और सामंजस्य की भी प्राप्ति होती है। एक स्वस्थ शरीर और अनुशासित बुद्धि ही भयमुक्त विश्व की मजबूत नींव हैं।
योग के माध्यम से जब हम स्वयं को नया बनाते हैं, तभी हम विश्व को भी नया बना सकते हैं। आज का विश्व आर्थिक आधार पर विभाजित हो चुका है, जहाँ भौतिकता के कारण निरंतर संघर्ष चलता रहता है। लेकिन सबसे बड़ी विफलता यह है कि हम एक-दूसरे की भावनाओं को समझने में असमर्थ रहे हैं। और यह तब तक संभव भी नहीं है जब तक हम स्वयं को नहीं समझते।
स्वामी विवेकानंद ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक राजयोग में कहा है कि प्रत्येक आत्मा का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है और उसमें यह सामथ्र्य है कि वह प्रकृति को नियंत्रित कर अपनी आंतरिक और बाह्य शक्तियों को प्रकट कर सके। उन्होंने यह भी संदेश दिया कि अपने कर्म और साधना के माध्यम से इसे अनुभव करो, लेकिन अपनी विचाराधारा को दूसरों पर थोपने का प्रयास मत करो। स्वयं स्वतंत्र रहो और दूसरों को भी स्वतंत्र रहने दो – यही सच्चा धर्म और जीवन का कत्र्तव्य है।
योग किसी व्यापार या प्रदर्शन की वस्तु नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक अवस्था है। जब हम योग को केवल बड़ी-बड़ी और जटिल बातों के रूप में देखते हैं तो हमें यह कठिन लगने लगता है और हमारा विश्वास डगमगाने लगता है। लेकिन यदि हम इसे छोटे-छोटे सरल कदमों में समझें तो महसूस होता है कि यह तो हम भी कर सकते हैं, यह मार्ग हमारे लिए भी संभव है।
योग न तो कोई व्यवस्था है और न ही किसी की निजी सम्पत्ति है। यह एक अवस्था है, जो सम्पूर्ण मानव जाति की धरोहर है। यह केवल इस युग के लिए नहीं, बल्कि अनेक युगों के लिए मानव जीवन को श्रेष्ठ और सम्पूर्ण बनाने का साधन है। योग के माध्यम से हम शारीरिक और मानसिक स्तर पर सशक्त बनते हैं और जीवन के वास्तविक आनंद का अनुभव करते हैं।




