मुख पृष्ठकथा सरिताप्रेम की मिठास

प्रेम की मिठास

गुरुकुल में शिक्षा प्राप्त कर रहे एक शिष्य को अपने पिता का संदेश मिला। पिता ने उसे घर बुलाया था। बिना देर किये शिष्य गुरु के पास गया और उनसे घर जाने की अनुमति मांगी। गुरु द्वारा अनुमति दे दी गई और अगले दिन शिष्य घर की ओर निकल पड़ा। वह पैदल चला जा रहा था। गर्मी के दिन थे। रास्ते में उसे प्यास लगी।
वह पानी का स्रोत ढूंढते हुए आगे बढऩे लगा। रास्ते में एक किनारे उसे एक कुआं दिखाई पड़ा। उसने कुएं से पानी निकाला और अपनी प्यास बुझाई। उस कुएं का पानी शीतल और मीठा था। शिष्य उसे पीकर तृप्त हो गया। वह आगे बढऩे को हुआ ही था कि उनके मन में विचार आया- इतना मीठा जल मैंने आज तक कभी नहीं पिया। मुझे गुरुजी के लिए यह जल ले जाना चाहिए। वह भी तो इस मीठे जल का पान करके देखें। यह सोचकर उसने कुएं से जल निकाला और मशक में भरकर वापिस गुरुकुल की ओर चल पड़ा। गुरुकुल में उसे देख गुरु जी ने चकित होकर पूछा, ”वत्स, तुम इतनी जल्दी लौट आये?”
शिष्य ने उन्हें अपनी वापसी का कारण बताया और मशक में भरा हुआ जल उनकी ओर बढ़ा दिया। गुरु जी ने वह जल पिया और बोले, ”वत्स, ये तो गंगाजल की तरह है। इसे ग्रहण कर मेरी आत्मा तृप्त हो गई।” गुरु के शब्द सुन शिष्य प्रसन्न हो गया। उसने पुन: गुरु से आज्ञा ली और अपने घर की ओर निकल गया। शिष्य द्वारा लाया गया मशक गुरु जी के पास ही रखा था। उसमें कुछ जल अब भी शेष था। उस शिष्य के जाने के थोड़ी देर बाद गुरुकुल का एक छात्र गुरु जी के पास गया।
उसने वह जल पीने की इच्छा जताई, तो गुरु जी ने उसे मशक दे दिया। छात्र ने मशक के जल का एक घूंट अपने मुँह में भरा और तुरंत बाहर थूक दिया। वह बोला, क्रक्रगुरु जी, ये जल कितना कड़वा है। मैं तो उस शिष्य की आपके द्वारा की गई प्रशंसा सुन इसका स्वाद लेने आया था। किंतु अब मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आपने उसकी झूठी प्रशंसा क्यों की?”
गुरु जी ने उत्तर दिया, ”वत्स, हो सकता है इस जल में शीतलता और मिठास नहीं, किंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि इसे लाने वाले के मन में प्रेम अवश्य है। जब उसने वह जल पिया, तो मेरे प्रति मन में उमड़े प्रेम के कारण वह मशक में जल भरकर गुरुकुल वापस लौट आया, ताकि मैं उस जल की मिठास का अनुभव कर सकूँ। मैंने भी जब इस जल को ग्रहण किया तो इसका स्वाद मुझे ठीक नहीं लगा। किंतु मैं उस शिष्य के हृदय में उमड़े प्रेम को देखते हुए उसे दु:खी नहीं करना चाहता था। इसलिए मैंने इस जल की प्रशंसा की। ये भी सम्भव है कि मशक के साफ न होने के कारण जल का स्वाद बिगड़ गया हो और वह वैसा न रहा हो, जैसा कुएं से निकाले जाते समय था। जो भी हो, मेरे लिए वह मायने नहीं रखता। जो मायने रखता है, वह है उस शिष्य का मेरे प्रति प्रेम। उस प्रेम की मिठास मेरे लिए जल की मिठास से अधिक महत्त्वपूर्ण है।
सीख : हमें किसी भी घटना का सकारात्मक पक्ष देखना चाहिए। नकारात्मक पक्ष देखकर न सिर्फ हम अपना मन मलिन करते हैं, बल्कि दूसरों का भी, इसलिए सदा अच्छाई पर ध्यान दें।”

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