आलीराजपुर -मध्य प्रदेश। शिक्षा का सही अर्थ है कि विद्यार्थी ज्ञानवान के साथ-साथ संस्कारवान बने और आदर्श शिक्षक वह है जो आचरण से शिक्षा दे। शिक्षक एक पवित्र शब्द है, इस पर कभी दाग नहीं लगना चाहिए। शिक्षक स्वयं जलकर उजाला करता है। मनुष्य में सबसे बुद्धिमान शिक्षक है, पर आज वह भी परेशान है, जबकि वह आत्मविश्वास व शांति का पाठ पढ़ाता है और गुलाब की तरह खुशबू बिखेरता है।
उक्त विचार इंदौर से पधारे जीवन जीने की कला के पथ-प्रदर्शक ब्रह्माकुमार नारायण भाई ने असाड़ा राजपूत समाज द्वारा ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय दीपा की चौकी में आयोजित 20वें शिक्षक सम्मान समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए।असाड़ा राजपूत समाज के मीडिया संयोजक उमेश वर्मा कछवाहा ने जानकारी देते हुए बताया कि समाज द्वारा 20वां शिक्षक सम्मान समारोह आयोजित किया गया जिसमें इस वर्ष सेवा निवृत शिक्षकों का सम्मान और वर्तमान में कार्यरत सैकड़ों शिक्षकों का सम्मान किया जाता हैं।

साथ ही ब्रह्मकुमार नारायण भाई ने कहा कि आज सद्भावना खत्म हो रही है, शिक्षा और चिकित्सा में व्यवसायीकरण आ गया है। शिक्षक का दायित्व हैं कि सद्भावना जागृत करना, आपस में स्नेह-प्यार बढ़ाना ही शिक्षा का लक्ष्य होना चाहिए, ना कि द्वेष भावना पैदा करना। राधा-कृष्ण में आकर्षण है, उनकी कथनी और करनी एक है, हमें भी वैसा ही बनना है।
उन्होंने आगे कहा कि मनुष्य के पास विचार शक्ति के रूप में अनुपम सौगात है। हम अपनी सोच को सकारात्मक और शक्तिशाली बना दें तो जीवन में कोई भी समस्या नहीं रहेगी। जो गलती करता है वह उसके खाते में जुड़ती है। ईमानदारी-सत्यता से आनंद आता है जो कभी पाप नहीं करने देती। कलयुग से सतयुग बनाना है तो स्वयं परिवर्तन करना होगा – जैसी वृत्ति, वैसी दृष्टि।
विशेष अतिथि नवोदय प्राचार्य उपाध्याय ने कहा कि आज विद्यार्थी मूल्यपरक शिक्षा पाने के बजाय केवल नौकरी पाने की चाहत रखता है, ऐसे में शिक्षक ही परिवर्तन ला सकता है। शासन द्वारा कौशल विकास और भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाया जा रहा है।
विशेष अतिथि डॉ. राजेंद्रसिंह वाघेला (इंदौर) ने कहा कि समाज में राष्ट्र की भावी पीढ़ी को संवारने का दायित्व शिक्षक का है, जो बच्चों में अनुशासन, रचनात्मक और सकारात्मक सोच को जागृत करता है। ईश्वर से पहले गुरु का महत्व है। भौतिक जगत के ज्ञान के साथ-साथ हमें अपने आंतरिक जगत को भी खोजना होगा, आंतरिक अन्वेषक बनना होगा। मैंने भी शिक्षक के रूप में सेवाएं दी हैं और शिक्षकों के आदर्श से ही इस मुकाम पर पहुंचा हूं।
सेंटर की संचालिका ब्रह्माकुमारी माधुरी बहन ने कहा कि बच्चों में नैतिक मूल्यों की कमी हो रही है, इसलिए शिक्षकों को अपने दिव्य ज्ञान से बच्चों का भविष्य बनाना चाहिए। वर्तमान समय में शिक्षा के साथ-साथ सुसंस्कार आवश्यक है। शिक्षा और विवेक का सामंजस्य बनाकर ही जीवन परिपूर्ण बन सकेगा।
समाज अध्यक्ष मानेंद्र सिंह गेहलोत, भैरूसिंह चौहान एवं नवचेतना मंडल अध्यक्ष नीलम गेहलोत ने शिक्षकीय दायित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि राजपूत समाज के काफी लोग शिक्षा वर्ग से जुड़े हैं, यह गौरव की बात है। उन्होंने सशक्त एवं सक्षम नारी शिक्षा पर भी अपने विचार रखे। बी.के.सानिया बेन और सेना बेन अतिथियों का स्वागत किया।
समाजसेवी अरुण गहलोत ने बताया कि प्रतिवर्ष सेवानिवृत्ति से पूर्व शिक्षकों का सम्मान किया जाता है, इस वर्ष डॉ. राजेंद्रसिंह वाघेला, श्रीमती अनिता गेहलोत, शर्मिला सिसोदिया, सरिता वाघेला एवं चेतन वाघेला का सम्मान किया गया। सभी को मोमेंटो साल श्रीपाल प्रदान किया गया इस कार्यक्रम में 180 टीचर्स बाय बहनों ने भाग लिया।अपनी सोई हुई आंतरिक शक्तियों को राजयोग द्वारा जगाएं तो यही मानव देव बन जाएगा। अंत में उन्होंने संदेश दिया कि नजर बदलो तो नजारे बदल जाएंगे, नियमित मेडिटेशन का अभ्यास करें और स्वस्थ रहें।
अर्जुन भाई ने स्वागत गीत गाया। कार्यक्रम का संचालन अविनाश वाघेला और बी.के.ज्योति बेन ने किया एवं आभार अरुण गहलोत ने माना।




