मुख पृष्ठब्र.कु. गीतानिरन्तरता... देह और आत्मा के अन्तर को मिटायेगी

निरन्तरता… देह और आत्मा के अन्तर को मिटायेगी

करत करत अभ्यास के, जड़ति होत सुजान, रसरी आवत-जात तें, सिल पर परत निशान। ये दोहा भल भक्ति का है पर हमें जो करना है, बाबा जो हमसे चाहते हैं, ये बारम्बार अभ्यास से ही सम्भव होगा। बस, उमंग के साथ करना है, अभ्यास करने लग जाना है बाकी तो परछाई की तरह परिणाम होगा ही

मुझे बार-बार अपने आप को देहभान से डिटैच करते रहना है, महसूस करना है। बाबा सुनाते, समझाते हैं हमारा काम क्या है? समझना, अभ्यास करना, अनुभव करना। सारा दिन में वो फॅालो करना है। रोज़ की मुरली रोज़ मुझे अभ्यास में लानी है। भक्ति में तो सत्य ज्ञान नहीं था,हर एक ने अपनी मतें सुनाई और अनेक मतें हो गई। बाबा कहते हैं ना एक सत्य मत मैं ही देता हँू अब हमें कुछ ढूंढना नहीं है। हमें सत्य मिल चुका है। अब हमें क्या करना है? अभ्यास में और आचरण में लाना है। जो बाबा कहते हैं उसे मुझे महसूस करना है। जो एहसास करेगा वो चेंज तुरंत करेगा। परिवर्तन करने में समय क्यों लगता है? भगवान कहे और हम कर क्यों नहीं पा रहे हैं? क्योंकि हम एहसास नहीं कर पा रहे हैं। कौन आया है? और वो क्या कह रहा है? अगर मुझे समझ में आ रहा है तो समझ में आने का मतलब क्या है? स्वरूप बनना, जीवन में समान बनना। जैसे हम हॉल में बैठे हैं। पता है हॉल अलग और हम अलग हैं। इस सोफा, कुर्सी पर बैठे, पता है ना सोफा अलग है, मैं अलग हँू। हमने वस्त्र पहने हैं समझ रहे हैंना वस्त्र अलग हैंमैं अलग हँू। इसी तरह गहराई से समझना है कि शरीर अलग है,मैं आत्मा अलग हँू। शरीर तत्व है, मिट्टी है, मैं आत्मा लाइट हँू, माइट हँू। जीवन में सारी भौतिकता और भोग की उत्पत्ति इस शरीर के भान से ही हुई। खुद को देह समझा, इसलिए खाने में, पीने में, नहाने में, सोने में इन चीज़ों में बुद्धि लगी है। फिर शरीर के संबंध, वैभव, पदार्थ, प्रवृत्ति। अब बाबा ने हमें महसूस कराया, अब खुद में स्थित होना है। खुद को ऊँच बनाना है। खुद को शुद्ध बनाना है। तो आत्म स्मृति का अभ्यास, मुरली में भी बाबा कहते हैं मैं मुख द्वारा बोल रहा हँू, तुम कान द्वारा सुन रहे हो। हमें ये प्रैक्टिस करनी होगी। ज्ञान तो आ गया, पर ज्ञान मात्र से देहीअभिमानी नहीं बन जायेंगे। हमें प्रैक्टिस करनी होगी। हमें बार-बार खुद को डिटैच करना होगा।
मुरली से पता चलता है ना कि ब्रह्मा बाबा ने कितना अभ्यास किया। बाबा की जीवन कहानी में भी पढ़ते हैं। बाबा लिखते थे, आत्मिक दृष्टि का अभ्यास करते थे, यशोदा आत्मा, बाबा की धर्म पत्नी का नाम यशोदा था ना। बाबा लिख-लिखकर पक्का करते थे। अनेक जन्मों से देह दृष्टि का अभ्यास रहा है। अब ये पाठ पक्का हो गया। भल पवित्र रहते हैं तो भी देह संबंध का भान तो रहता है ना! देह संबंध के अधिकार से व्यवहार करते हैं। बाबा कहते हैं ना कि वो रग जाती नहीं। हमें वो अभ्यास करना है। लिखो अपने-अपने परिवार के नाम, डायरी में लिखो, पाठ पक्का करो। अशरीरीपन की स्थिति के ये स्टैप हैं। आत्म स्मृति, कर्मेन्द्रियों से डिटैच मैं मुख से बोल रही हँू। कान से सुन रही हँू। मैं आँखों से देख रही हँू। भल देखने में शरीर आयेगा पर देखते हुए भी आत्मिक भान होगा, ये प्रैक्टिस करनी होगी। और उसे महसूस भी करना होगा।
तीसरा अभ्यास लक्ष्य रखो, अटेंशन रखना है मुझे हर कर्म आत्म स्वधर्म में स्थित होकर करना है। आत्मा का धर्म कौन-सा? हमारा स्वधर्म कौन-सा? शांति और पवित्रता। पता है ना मुझ आत्मा के मूल धर्म कौन-से है? शांति, सुख, आनंद, प्रेम, पवित्रता, ज्ञान और शक्ति। मुझे हर कर्म शांति से करना है। प्यार से, ज्ञान स्वरूप बनकर करना है, शुद्धि से करना है। तो आत्म अभिमानी स्थिति बने। ये तो अभ्यास है। और जीवन भर के अभ्यास से ही स्थिति बनती है। ये साधारण शरीर छिप जाए, मेरा ज्योति स्वरूप प्रत्यक्ष हो। मेरा स्वरूप कौन-सा है? ज्योति स्वरूप आत्मा है। ये स्थूल हड्डी-मांस का शरीर गायब हो जाए और मेरा ये ज्योति स्वरूप प्रत्यक्ष हो जाए।
आपने देखा होगा रात के अंधेरे में ट्रैवल करते हैं,दूर से मोटर आती है, क्या दिखाई देता है? लाइट दिखाई देती है। उनके फोकस ही इतने पॉवरफुल होते हैं कि दूर से लाइट दिखाई देती है। मोटर गायब हो जाती है। हमारा भी ये फोकस इतना पॉवरफुल हो कि लाइट दिखाई दे, ये छिप जाये। मुझे इतनी निरतंर आत्म स्मृति रहे। मैं प्रकाश बिंदु, प्रकाश के घेरे में। हर कर्मेन्द्रियों से आत्म-अभिमानिता का तेज दिखाई दे। देखो, नाम रूप तो ये ही हैं और अंत तक ये ही रहेगा। ये थोड़े ही बदलेगा, बदलना क्या है? आत्म स्थिति बदले। बाबा कहते हैं ना आप में बाप दिखाई दे। तो चेहरा तो ये ही रहेगा पर मेरी स्थिति, स्मृति, वृत्ति बाप समान बने,वो दिखाई दे। चेहरा तो वही साधारण है पर अन्दर में खुशी है। ऐसा चेहरा कोई देखेगा तो पूछेगा ना कि क्या बात है? तो चेंज क्या हुआ? अन्दर खुशी।
अगर हमारे अन्दर चिंता, टेंशन, परेशानी है तो कहते हैं ना कि क्या बात है? टेशन में लग रहे हो। तो अन्दर की स्थिति, वृत्ति, चेहरे द्वारा दिखाई देती है ना! तो जितना हम आत्मअभिमानी स्थिति बनायेंगेे, जितना बाबा याद रहेगा तो हमारे चेहरे से क्या दिखाई देगा! वो चीज़ें दिखाई देंगी जो अन्दर होंगी। ऐसी स्थिति हमें बनानी है। ऐसी स्थिति हमारी बनी रहे तब हम कहाँ भी होंगे चाहे परिवार, चाहे भीड़ के बीच, लेकिन हम अलग ही दिखाई पड़ेंगे और देखने वाले कहेंगे ये योगी-तपस्वी आत्मा हैं।

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