द्वारकाधीश कृष्ण पांडवों के संधिदूत बनकर आ रहे थे। दु:शासन का भवन जो राजभवन से भी सुंदर था, वासुदेव के लिए वह खाली कर दिया गया था। धृतराष्ट्र ने आदेश दिया कि हमारे यहाँ की सर्वोत्तम वस्तुएँ दु:शासन के भवन में एकत्र कर दी जाएँ और वासुदेव को भेंट कर दी जाएँ। दुर्योधन के मन में यद्यपि प्रेम नहीं था तथापि वह अपने पिता की आज्ञा का पालन कर रहा था। उसने भवन, मार्ग आदि इस तरह सजवा दिए थे कि वे हस्तिनापुर के इतिहास में बेजोड़ थे।
द्वारकाधीश कृष्ण का रथ आया। नगर से बाहर जाकर दुर्योधन ने भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, विदुर आदि सम्मानीय पुरूषों व भाइयों के साथ उनका स्वागत किया। उनके साथ सब नगर में आये। दुर्योधन विनम्रता पूर्वक बोला-”पधारें वासुदेव!” मगर वासुदेव बोले -” आपके उदार स्वागत के लिए धन्यवाद, किंतु दूत का कर्त्तव्य है कि जब तक उसका कार्य पूर्ण न हो, वह दूसरे पक्ष के यहाँ भोजनादि न करे। जो भूख से मर रहा हो, वह चाहे जहाँ भोजन कर लेता है, किंतु जो भूखा नहीं है, वह दूसरे घर तभी भोजन करता है, जब उसके प्रति वहाँ प्रेम हो। भूख से मैं मर नहीं रहा हूँ और प्रेम आपमें है नहीं।” द्वारकाधीश का रथ मुड़ गया विदुर के भवन की ओर। उनके लिए जो दु:शासन का भवन सजाया गया था, उसकी ओर तो देखा भी नहीं, इसीलिए तो कहा है – भाव के भूखे हैं भगवान।
शिक्षा :- भगवान बाहरी वैभव नहीं, बल्कि सच्चे प्रेम, श्रद्धा और निष्कपट भाव को स्वीकार करता है।

