दो गुणों ने उन्हें इतना सफल बनाया: पहला, उन्होंने एक भी क्षण व्यर्थ नहीं गंवाया;
और दूसरा, उनका लक्ष्य हमेशा बिल्कुल स्पष्ट रहा
ईश्वरीय परिवार के एक ऐसे अनन्य सेवाधारी, जो बाबा के दुवाओं में पले-बढ़े, वरिष्ठों की शुभकामनाओं के साथ कदम-दर-कदम आगे बढ़े और अनुशासन, पवित्रता, समर्पण तथा तपस्या के माध्यम से इस ईश्वरीय विश्वविद्यालय की मजबूत नींव रखी और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर तक ऊँचाइयों पर पहुँचाया। हम ऐसी सम्माननीय आत्मा आदरणीय बृजमोहन भाई साहब को अपनी हृदय की गहराइयों से श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
मैं लगभग पचपन वर्षों तक भाई साहब के साथ एक पवित्र और अत्यंत प्रेरणादायक सेवा संबंध से जुड़ी रही। ईश्वरीय परिवार के प्रति उनका प्रेम, उनकी ईमानदारी, समर्पण और बाबा के प्रति निष्ठा इतनी गहरी थी कि मैंने इतने शुद्ध प्रेम को कहीं और विरले ही देखा है—यह वास्तव में ईश्वरीय प्रेम की एक अद्भुत मिसाल थी।
दोहरी शक्ति से संपन्न आत्मा: एक बार आदरणीय गुलज़ार दादीजी ने मुझसे कहा, “सर्वशक्तिमान बाबा कहते हैं—इस आत्मा में दोहरी शक्ति है।”
वास्तव में, वे ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने असंभव को संभव में बदल दिया। उन्होंने न केवल ईश्वरीय विश्वविद्यालय की जटिल परिस्थितियों का समाधान किया, बल्कि वे कुशल, सकारात्मक और अपने व्यावसायिक जीवन में शांत एवं शक्तिशाली व्यक्तित्व वाले भी थे।
जब उन्होंने फर्टिलाइज़र कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, नांगल में कार्य किया, तो जब भी कोई समस्या आती, लोग कहते थे— “इसे उस्ताद पेड्रो (बृजमोहन भाई साहब) के पास ले जाओ; वे निश्चित रूप से इसका समाधान कर देंगे।”
उनके लिए “यह काम बहुत कठिन है”—ये शब्द मानो उनके शब्दकोश में थे ही नहीं। वे अक्सर कहा करते थे, “कठिनाइयाँ केवल हमें प्रगति करने में मदद करती हैं।”
इस विश्व नाटक में हम सभी अपने-अपने पार्ट निभाने वाले अभिनेता हैं और एक दिन हर व्यक्ति का पार्ट संपन्न हो जाएगा। सम्माननीय बृजमोहन भाई साहब ने एक महावीर की भूमिका निभाई—आत्म विश्वास, ईश्वरीय शक्ति से सदैव संपन्न विजयी रहने वाले, और बाबा को अपने निरंतर साथी के रूप में सदा अपने साथ रखने वाले भाई साहब रहे ।
शुरुआत में ईश्वरीय सेवाओं की नींव रखी: जब ईश्वरीय विश्वविद्यालय की स्थापना हुई और 1952 में सेवाएँ प्रारम्भ हुईं, तब पहला सेवा केन्द्र कमला नगर, दिल्ली में खोला गया। बाबा ने कहा, “यज्ञ के माध्यम से यह सेवा कार्य चल गया है, लेकिन कुछ गृहस्थ ऐसे होने चाहिए जो सेवा केन्द्र खोलें।”
तब यज्ञ में भाई-बहनों के माता-पिता, जिन्हें प्यार से चाचा और चाची कहा जाता था, जिन्होंने अपने घर में एक केन्द्र खोला। वहाँ की पहली शिक्षिका आदरणीय दादी प्रकाशमणि थीं। वही सेवा केन्द्र धीरे-धीरे विस्तृत होकर आज के पाण्डव भवन, करोल बाग, दिल्ली (क्षेत्रीय मुख्यालय) में परिवर्तित हो गया।
ज्ञान की चर्चाओं के प्रेमी थे: वे प्रतिभाशाली, बौद्धिक और आध्यात्मिक चर्चाओं के अत्यंत रूचि रखते थे। जो भी उनके पास आता, वे कभी सतही ढंग से बात नहीं करते थे। जब तक वे सामने वाली आत्मा को ज्ञान को स्पष्ट रूप से समझा नहीं देते थे, तब तक उन्हें संतुष्टि नहीं होती थी।











–राजयोगिनी आशा दीदी
(डायरेक्टर ओ आर सी)


