Homeलेखमन की बातें- राजयोगी ब्र.कु. सूरज भाई

मन की बातें- राजयोगी ब्र.कु. सूरज भाई

प्रश्न : मेरा नाम एपी मेहता है, मैं फिरोज़पुर पंजाब से हूँ। ब्रह्ममुहूर्त में ही भगवान को याद क्यों करना है? हर जगह का टाइम अलग-अलग है। क्योंकि जब यहाँ अमृतवेला है तो दूसरी जगह दोपहर है, कहीं शाम है, कहीं रात है तो बदलता रहता है। भगवान तो स्वतंत्र है।
उत्तर : ये सत्य है कि भगवान के लिए ये बेलाएं नहीं होती। क्योंकि वो जहाँ है वहाँ सूरज, चांद होते ही नहीं। उसके लिए तो सदा ही अमृतवेला है। इसका महत्त्व हम सबके लिए जो हम अभ्यास करते हैं, और वो महत्त्व इसलिए है क्योंकि सवेरे उठते ही हमारा सब्कॉन्शियस माइंड एक्टिव रहता है। सवेरे उठते ही हमारा मन भी शांत रहता है। ये सबको अनुभव है। उस वक्त मनुष्य सुन्दर विचार पैदा कर सकता है। जिस देश में भी हम हैं वहाँ सुबह हुई है तो प्रकृति का सौन्दर्य भी है, स्वच्छ है। लोग भी बहुत सोए होते हैं। वायब्रेशन्स भी अच्छे होते हैं। तो हमारी एकाग्रता भी बहुत अच्छी होती है। हमारे मन में सुन्दर विचार उत्पन्न होते हैं। जो परमात्मा तक पहुंचते हैं। जो उसके वायब्रेशन्स को अट्रैक्ट करते हैं। वो तो सदा हमारे लिए हैं और सदा ही देने के लिए तैयार हैं। जिस देश में, जिस समय अमृतवेला है मान लो लंडन मान लो यहाँ से साढ़े पांच घंटा पहले। जब यहाँ अमृतवेला होगा तो वहाँ तो रात होगी। और जब यहाँ 11:30 बजेंगे तो वहाँ सवेरे का टाइम होगा। जब यहाँ 9 बजेंगे तो वहाँ सवेरे का टाइम होगा। तो उनके लिए वो समय गुड है। क्योंकि उस वक्त प्रकृति के वायब्रेशन्स गुड हैं। उस वक्त उनका मन बहुत सुन्दर स्थिति में होगा। परमात्मा की हर चीज़ को ग्रहण कर सकते हैं। रिसिव कर सकते हैं। इसके अलावा भी हम सारा दिन भी परमात्म शक्तियों को ग्रहण कर सकते हैं। हम उनसे अपना कॉन्टेक्ट कर सकते हैं। ये इसमें बात परमात्मा की नहीं इसमें बात मानसिक स्थिति की होती है। सुबह-सुबह प्रकृति की मदद हमें मिल जाती है।

प्रश्न : मेरा नाम भूपेन्द्र है। मैं चार साल से विद्यालय से जुड़ा हुआ हूँ। मैं जिस ऑर्गनाइजेशन में काम करता हूँ, वहाँ पर मेरे जो बॉस हैं वो, जो ऑर्गेनाइजेशन में खर्च किया जाना चाहिए ये हॉल्स बिल बनाकर दे देते हैं और वो सारा हज़म कर लेते हैं। तो उनकी ये जो आदत है उसके कारण मैं बहुत डिस्टर्ब रहता हूँ। मैं क्या करूँ, मुझे वहाँ से निकल जाना चाहिए या मुझे अपने बॉस को सुधारने का कुछ प्रयास करना चाहिए?
उत्तर : जो इस संसार में ऑनेस्ट हैं उनको दूसरों की डिस्ऑनेस्टी प्रिय नहीं लगती है। ये तो बड़ी नैचुरल सी चीज़ है। लेकिन क्या करें ये तो कलियुग का अंत है और अनेक अधिकारी मनी माइंडेड हो चुके हैं। चाहे वो सरकार से मिले या किसी कम्पनी से मिले। उन्हें तो बस पैसे का रहता है। लेकिन ये फलीभूत नहीं होता। देखिए ये पाप भी है। लेकिन मैं आपको कहूँगा कि कलियुग का अंत है अब तो आपकी नौकरी का प्रश्न है। आप नौकरी छोड़ दें और भटकते रहें इधर-उधर। इसकी अभी जरूरत नहीं है। आपको अगर करना ही है तो पहले दूसरी नौकरी ढूंढ लें फिर रिजाइन करें। दूसरी जगह भी ऐसा ही मिल गया तो क्या करेंगे? क्योंकि हर जगह कलियुग का अंधकार छाया हुआ है। इस करप्शन के लिए हमारी सरकारें कितना भी वायदा करें जैसे वाजपेयी जी कहते थे ना कि ये गहरी जड़ें जमा चुका है अन्दर। कैंसर के रोग की तरह व्याप्त हो चुका है। अब इसको निकालना ये किसी एक व्यक्ति के बस का नहीं है। और अगर ऊपर तक बात पहुंचाएंगे तो ये मारे जाएंगे। इसलिए आपको काम बहुत सोच-समझ कर करना है। अपना कार्य करते रहें।
आपको अपने बॉस को एक-आधा घंटा गुड वायब्रेशन देने चाहिए, योग अभ्यास करके। माइंड टू माइंड उनसे बात करें रोज़ सवेरे दो मिनट, तीन मिनट एक समय फिक्स करके। ताकि उनके अन्दर भी जो प्युअर संस्कार हैं वो जागृत हो जाएं। और वो इस बुरी चीज़ से बच जाएं। क्योंकि ऐसा हो रहा है जो लोग ऐसे कार्यों में लगे रहते हैं कहीं न कहीं तो फँसते ही हैं। पकड़े जाते हैं फिर बिचारे जेल में भी रहते हैं। फिर सारी धन-सम्पत्ति भी चली जाती है। कंगाल के कंगाल, कई केस तो हो चुके हैं। लेकिन ये सब देखते भी मनुष्य सुधर नहीं रहा है। वो सोचता है कि ठीक है जब होगा देखा जाएगा। तब तक कमा लो। लेकिन ये उचित नहीं है। ये हमारे देश के कल्याण के लिए भी नहीं है। जिस कम्पनी के लिए आप काम करते हो उस कम्पनी के लिए आपको बहुत डेडिकेटेड, बहुत ऑनेस्ट होना चाहिए।

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