परमात्म ऊर्जा

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अगर एक-एक मर्यादा को जीवन में लाने का प्रयत्न करेंगे तो कहाँ मुश्किल कहाँ सहज लगेगा और इसी प्रैक्टिस में व इसी कमज़ोरी को भरने में ही समय बीत जायेगा। इसलिए अब एक सेकण्ड में मर्यादा पुरूषोत्तम बनो। कैसे बनेंगे? सिर्फ सदा स्नेही बनने से। बाप का सदैव स्नेही बनने से, बाप द्वारा सदा सहयोग प्राप्त होने से मुश्किल बात सहज हो जाती है। जो सदा स्नेही होंगे उनकी स्मृति में भी सदा स्नेह ही रहता है, उनकी सूरत से सदा स्नेही की मूर्त प्रत्यक्ष दिखाई देती है। जैसे लौकिक रीति से भी अगर कोई आत्मा किस आत्मा के स्नेह में रहती है तो फौरन ही देखने वाले अनुभव करते हैं कि यह आत्मा किसके स्नेह में खोई हुई है। तो क्या रूहानी स्नेह में खोई हुई आत्माओं की सूरत स्नेही मूर्त को प्रत्यक्ष नहीं करेगी? उनके दिल का लगाव सदैव उस स्नेही से लगा हुआ रहता है। तो एक ही तरफ लगाव होने से अनेक तरफ का लगाव सहज ही समाप्त हो जाता है। और तो क्या लेकिन अपने आप का लगाव अर्थात् देह-अभिमान, अपने आपकी स्मृति से भी सदैव स्नेही खोया हुआ होता है। तो सहज युक्ति व विधि जब हो सकती है, तो क्यों नहीं सहज युक्ति, विधि से अपनी स्टेज की स्पीड में वृद्धि लाती हो! सदा स्नेही, एक सर्वशक्तिमान के स्नेही होने कारण सर्व आत्माओं के स्नेही स्वत: बन जाते हैं। इस राज़ को जानने से राज़युक्त, योगयुक्त व दिव्यगुणों से युक्तियुक्त बनने के कारण राज़युक्त आत्मा सर्व आत्माओं को अपने आप से सहज ही राज़ी कर सकती है। जब राज़युक्त नहीं होते हो, तब कोई को राज़ी नहीं कर सकते हैं। अगर उसकी सूरत व साज़ द्वारा उसके मन के राज़ को जान जाते हैं, तो सहज ही उसको राज़ी कर सकते हैं। लेकिन कहाँ-कहाँ सूरत को देखते, साज़ को सुनते उनके मन के राज़ को न जानने के कारण अन्य को अभी भी नाराज़ करते हो व स्वयं नाराज़ होते हो। सदा स्नेही के राज़ को जान राज़युक्त बनो। अच्छा। भविष्य में विश्व के मालिक बनना है, यह तो पता है ना! मगर अभी क्या हो? अभी विश्व के मालिक हो व सेवाधारी हो?

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