हमारा व्यवहार ही हमारी पहचान है

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गाँव रत्नापुर में एक प्राचीन मंदिर था। उस मंदिर में प्रतिदिन एक पुजारी पूजा-पाठ करता था। पुजारी के पास एक हाथी था, जिसे वो अपने साथ प्रतिदिन मंदिर लेकर जाता था। सभी गाँव के लोग हाथी को बहुत पंसद करते थे। हाथी भी मंदिर में आने वाले सभी श्रद्धालुओं का खूब स्वागत किया करता था। सुबह पूजा करने के बाद पुजारी अपने हाथी को तालाब में ले जाकर नहलाया करता था। प्रतिदिन हाथी नहाने के बाद घर लौटते वक्त एक दर्जी की दुकान पर रूकता था। दर्जी भी प्रतिदिन हाथी को प्यार से एक केला खिलाता था। हाथी केला खाने के बाद अपनी सूंड से दर्जी को नमस्ते करके चला जाता था। ये सब हाथी और पुजारी की रोजमर्रा की जि़ंदगी का एक हिस्सा था। एक दिन हाथी जब दर्जी की दुकान पर केला खाने के लिए रूका, तो दर्जी को शरारत करने का दिल हुआ। उसने हाथी को केला देने के बाद अपने हाथ में सुई रख ली। जैसे ही हाथी ने उसे नमस्ते किया, दर्जी ने उसकी सूंड पर सुई चुभा दी। सुई चुभते ही हाथी ज़ोर से चिंघाड़ते हुए करहाने लगा। दर्जी ने हाथी के दर्द का खूब मज़ाक उड़ाया और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा। पुजारी को पता नहीं चला कि क्या हुआ। वो हाथी को सहलाते हुए अपने घर लेकर चला गया। अगले दिन फिर पुजारी और हाथी तालाब से लौटकर आ रहे थे। पुजारी कुछ दूर रूककर लोगों से बात करने लगा। हाथी रोज़ की तरह दर्जी की दुकान पर रूक गया। आज हाथी ने अपने सूँड में कीचड़ भर लिया था। दर्जी अपनी दुकान में बैठकर कपड़ों की सिलाई कर रहा था। जैसे ही दर्जी ने हाथी को देखा, वैसे ही हाथी ने उसकी पूरी दुकान में कीचड़ फेंक दिया। उस कीचड़ से उसकी दुकान के सीले हुए सारे कपड़े खराब हो गए। यह सब देखकर दर्जी समझ गया कि मैंने कल जो किया था, उसी का दण्ड हाथी ने मुझे आज दिया है। दर्जी को अपनी गलती का एहसास हुआ और हाथी के पास भागकर गया और उसने हाथी से माफी मांगी। हाथी ने दर्जी की तरफ देखा और अपनी सूंड को हवा में लहराते हुए वहाँ से चला गया। दर्जी को बहुत बुरा लग रहा था। उसने अपने मस्ती के चक्कर में एक अच्छा दोस्त हाथी खो दिया था। उस दिन से दर्जी ने ठान लिया कि वो किसी का भी मज़ाक नहीं उड़ाएगा।

सीख : किसी के साथ भी बुरा व्यवहार नहीं करना चाहिए। वो लौटकर आता है।

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