हमारा ऐसा मुस्कुराता चेहरा हो… जो भी देखे तो वो भी मुस्कुराने लगे..

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बाबा की दृष्टि महासुखकारी है। शुरू के दिनों में हम बाबा की दृष्टि से जैसे पागल हो गये थे। ऐसे में बाबा हमारी टेस्ट लेने के लिए 2-3 महीना कहीं चला गया। वहाँ बैठे भी वायुमण्डल में बाबा के ऐसे वायब्रेशन आते थे जो हर एक को सहयोगी बना देते थे। बाबा ने अपने अनेक बच्चों को सहयोगी बना करके सहज योगी बना दिया है। हम हंसी में कहती थी कि हम मुफ्तलाल कम्पनी में रहते हैं। वो तो कपड़े की मील का नाम था। लेकिन हम बिगर कौड़ी बादशाह हैं, बेफिक्र बादशाह हैं। थोड़ा-सा सम्पूर्ण बनने का, बाप समान बनने का फिक्र है। बनना है ज़रूर, पर मैं बनूं, उसका सबूत है – आसमान में देखो सारे स्टार्स दिखाई देते हैं। लेकिन चन्द्रमा की चमक अपनी होती है। तो हमारा भी ऐसा फूल मून डे की तरह सम्पूर्ण रूप हो। एक भी लकीर कम है, आगे की या पीछे की तो वो आकर्षण नहीं है। तो सम्पूर्ण चन्द्रमा समान बनने के लिए ज़रा भी कमी न हो। यह दिल में अगर हमारी भावना है तो भगवान छोड़ेगा, भले अभी अलबेलाई में सुस्ती में कोई न कोई कारण से पुरुषार्थ ढीला है, लेकिन ऐसा समय आयेगा जो बाबा खड़ा कर देगा। तो हमेशा मैं स्वयं को समझाती हूँ कि यह वक्त जा रहा है… फिर से नहीं आयेगा। अभी जो आपस में एक-दो का सहयोग है, आपस में स्नेह, प्रीत है। यह फिर नहीं होगा इसलिए हर आत्मा भाई-भाई है, यह अभ्यास अन्दर से पक्का हो। भले मैं अकेली बैठी हूँ या 10 के साथ बैठी हूँ, पर दृष्टि में हम आत्मायें भाई-भाई हैं। तो मैं सोचती हूँ यह पुरुषार्थ देवतायें थोड़े ही करेंगे, सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग, कोई भी युग में पुरुषार्थ नहीं है। उतरती कला है, बॉडीकॉन्सेस शुरू हो जाता है। सतयुग में तो यहाँ के पुरुषार्थ के अनुसार बहुत गुणवान होंगे, कोई कमी नहीं होगी। पर पुरुषार्थ करने का अभी जो समय है, इसमें बहुत फायदा है। समय साथ दे रहा है। मैं सच्ची बात सुनाती हूँ, जो भी बात है संकल्प में या कोई भी बात में समय व्यर्थ नहीं गंवाती हूँ, मन खाता है। हम आपस में ऐसे मिल करके बैठते हैं, योग करते हैं, रूहरिहान करते हैं या अकेले हैं, खाना खा रहे हैं, पर खाते भी बाबा अच्छा याद आ सकता है। याद अन्दर की बात है, खाना मुख द्वारा खा रहे हैं, याद अन्दर कर रहे हैं, यह अभ्यास संगम पर जो करते हैं वो बहुत सुख पाते हैं। मैं साक्षी हो करके देखती हूँ यहाँ लेबर भी जो झाड़ू लगाते हैं वह भी बहुत अच्छा मुस्कुराते हैं। लेकिन बाबा के बच्चे कोई तो ऐसे हैं जिनके लिए मुस्कुराना बहुत मुश्किल है। सीरियस हो जाते हैं, सीरियस रहने की नेचर खुशी खत्म कर देती है। उसको देख करके कोई खुश नहीं होगा। कई बार मैं अन्दर से अपने आपको पदमापदम भाग्यशाली समझती हूँ जो देखे वह मुस्कुराये।

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