Homeदादी जीदादी प्रकाशमणि जीपावरफुल तपस्या द्वारा सूक्ष्म संकल्प व पुराने संस्कारों का परिवर्तन

पावरफुल तपस्या द्वारा सूक्ष्म संकल्प व पुराने संस्कारों का परिवर्तन

हमारी शुभ भावना है कि हम बाबा को भी यह रिज़ल्ट दें कि बाबा अब हम सब बातों से उपराम हैं और समानता के समीप पहुंच चुके हैं। इसके लिए जो भी सूक्ष्म व्यर्थ संकल्प इधर-उधर के आते, चिंतन चलता वह सब स्टॉप हो जाएं।

वर्तमान समय मीठे बाबा ने हम सब बच्चों को यही इशारा किया है कि तुम हर एक को अब बाप समान बनना है, इसके लिए जब तक हम ऐसी पावरफुल तपस्या नहीं करेंगे तब तक बाप समान अव्यक्त फरिश्ता कैसे बनेंगे। समय के अनुसार हम हर एक को अव्यक्त फरिश्ता बनना है तो अन्दर जो भी पुराने सूक्ष्म संस्कार हैं, वृत्तियां हैं, वह सब बदलकर बाप समान बनने चाहिए तब ही हम अपनी कर्मातीत स्थिति का अनुभव कर सकेंगे। सचमुच हमारे संस्कार बाप समान समीप होते जाते? बेहद की सेवाओं में तो दिन-रात रहते परन्तु अपनी सूक्ष्म स्थिति तपस्या मूर्त हो। इसके लिए हम सेवायें करते उपराम कहाँ तक रहते हैं? त्याग तो किया है परन्तु उपराम कहाँ तक बने हैं, यह चेक करना है। उसमें भी हम सबसे पहले देह अभिमान से परे अशरीरी स्थिति का अनुभव करते हैं? अशरीरी रहने की प्रैक्टिस कहाँ तक है? इस प्रैक्टिस के लिए ज़रूर हमें विशेष एकान्त में रहने की, अन्तर्मुखी बनने की ज़रूरत है तभी हम अपने सूक्ष्म संकल्पों को सेकण्ड में समेट सकते हैं। चलते-फिरते कर्म करते जब हम यही अभ्यास करें, संकल्पों को ब्रेक दें तब लाइट हाउस, माइट हाउस बन सकते हैं। जब ऐसी स्थिति हो तब कहेंगे साक्षात्कारमूर्त।
जैसे साकार में बाबा को देखा – बाबा पै्रक्टिकल में कर्मयोगी, साक्षात्कारमूर्त फरिश्ता दिखाई देते थे। हमें भी फालो फादर करना है। इसके लिए बीच-बीच में सब संकल्पों को थोड़ा समय भी समेटकर अभ्यास करें तो इसका बहुत बल मिल जाता है। बैटरी चार्ज हो जाती है। आत्मा बाबा के लव में लीन हो जाती है। यह लवलीन होना, अशरीरी बनना ही आत्मा की बैटरी चार्ज करने का साधन है, इसी से विल पावर आती है और परिवर्तन भी सहज होता है।
तो चेक करें कि मेरी स्थिति कहाँ तक ऐसी बनी है। कहाँ तक हम विजयी बनें हैं। विजयी तब कहेंगे जब हमारा आपस में अव्यक्त मिलन हो, जिसको कहते हैं बहुत-बहुत स्वीट, बहुत-बहुत लवली। सेवाओं में तो दिन-रात रहते, वह ठीक है, बाबा की सेवा है। परन्तु बाप समान स्थिति सिर्फ सेवा से ही नहीं बनेगी, उसके लिए योगबल भी बहुत ज़रूरी है।
लाइट हाउस, पावर हाउस भी बनना है। वह बनेंगे एकान्त से, जिसको बाबा कहते बच्चे एक के अन्त में चले जाओ। ऐसे तो सदा योग का ध्यान रखते लेकिन एक साथ कुछ टाइम लगाके मन का मौन और मुख का मौन रख तपस्या करो तो इसमें बहुत मजा है। इसी तपस्या से स्वयं को विजयी रत्न, मायाजीत रत्न, संस्कार जीत रत्न अनुभव करेंगे।
हमारी शुभ भावना है कि हम बाबा को भी यह रिज़ल्ट दें कि बाबा अब हम सब बातों से उपराम हैं और समानता के समीप पहुंच चुके हैं। इसके लिए जो भी सूक्ष्म व्यर्थ संकल्प इधर-उधर के आते, चिंतन चलता वह सब स्टॉप हो जाएं। ऐसे स्वीट साइलेंस में रहने का अभ्यास करो तो सूक्ष्म संकल्पों में, व्यवहार में, बोल-चाल और भाषा में परिवर्तन आयेगा, बहुत-बहुत स्वीट बन जायेंगे।

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