Homeलेखपॉजि़टिव सोच ही है सही सोच

पॉजि़टिव सोच ही है सही सोच

पॉजि़टिव थिंकिंग एक ऐसा शब्द जो हमने कई बार सुना है, बोला है औरों को राय भी दी है। जब भी कोई उदास होता है, परेशान होता है तो हम प्यार से कंधे पर हाथ रखकर एक ही बात कहते हैं पॉजि़टिव सोचो। जब अपने जीवन में कोई बात आती है तो निगेटिव सोचना या कहें गलत सोचना लेकिन जिसको हमने कहा कि ये तो मेरी स्वाभाविक नैचुरल थिंकिंग है निगेटिव थिंकिंग जैसे कि डरना, चिंता होना, किसी पर ब्लेम करना, किसी की निंदा करना, किसी से ईर्ष्या होना, किसी से तुलना करना, किसी के साथ कम्पटीशन करना, हर्ट हो जाना किसी की बात को लेकर, किसी से तो नफरत ही करना बहुत बड़ा स्पेक्ट्रम है। कैसे पता चलेगा कि ये जो मेरी सोच है पॉजि़टिव है, राइट है या निगेटिव की कैटेगिरी में आती है? कोई भी ऐसी थॉट जो मेरे मन की स्थिति को डिस्टर्ब करती है। एक कम्फर्टेबल फीलिंग नहीं आती है। और जो वायब्रेशन दूसरों को जाते हैं और फिर उनके अन्दर भी एक डिस्टर्बेंस क्रियेट करते हैं, ये निगेटिव है। और हमको पता है कि निगेटिव थिंकिंग क्या है। लेकिन न चाहते हुए भी हम कहते हैं कि वो थॉट आ गया।
क्यों ऐसा होता है कि कोई बात आती है और निगेटिव ऑप्शन हमारे अन्दर जल्दी आता है। हम जो सोच रहे हैं वो क्रियेशन है। लेकिन इस थॉट की एनर्जी का सोर्स क्या है? क्यों ऐसा है कि किसी के अन्दर ज्य़ादा निगेटिव आ रहा है और किसी के अन्दर कम। तो किसी के अन्दर तो पॉजि़टिव बातें हैं, किसी के अन्दर बहुत अच्छी थॉट आती हैं। सबसे इम्पोर्टेन्ट सोर्स ऑफ थॉटस है इन्फॉर्मेशन। जैसे हम जब खाना खाते हैं। वो है रॉ मटेरियल जो अन्दर जाता है। और जैसा हमने खाना खाया वो हमारे शरीर की एनर्जी बनती है। उससे हमारे शरीर का इम्युनिटी सिस्टम बनता है। इसलिए हेल्थ का जब भी कोई इश्यू आयेगा सबसे पहले हमें कहा जायेगा कि अपनी डाइट को चेक करें और चेंज करें। अब इन्फॉर्मेशन मतलब क्या? जो हम सुनते हैं, पढ़ते हैं, देखते हैं। तीनों चीज़ें जो अन्दर जा रही हैं। ये यहाँ(आत्मा में) स्टोर हो रही है। अब सब्कॉन्सेस में स्टोर इन्फॉर्मेशन हमारे थॉट्स का हिस्सा बनती है। अगर हम कई दिनों से ये पढ़ रहे हैं या हम सुन रहे हैं किसी का एक्सीडेंट हुआ, कोई बच्चा मोटरसाइकिल पर जा रहा था ट्रक के साथ टक्कर हुई उसकी वहीं मृत्यु हो गई। एक बार सुना, दो बार सुना, दस बार सुना, कई महीनों से हम सुनते आये हैं फिर वो अन्दर बैठ गया।
शाम तक अगर आपका बच्चा घर टाइम पर नहीं पहुंचता और उसका फोन भी रेंज से बाहर है तो न चाहते हुए भी हम गलत सोचना शुरु कर देते हैं। कुछ हुआ तो नहीं उसको। क्यों हमने ऐसा सोचा? क्यों हम गलत सोचते हैं? हम क्यों नहीं ये सोच पाते कि कुछ अच्छा हुआ है इसलिए वो लेट हुआ है, उसे रास्ते में कोई दोस्त मिल गया होगा, वो कुछ काम कर रहा है इसलिए वो लेट हुआ है। ये निगेटिव सोचा क्यों माइंड ने? क्योंकि वो खाना हम खाकर मन में रख चुके हैं। माइंड फिर वो ही थॉट क्रियेट करेगा ना!
सिर्फ एक हफ्ते के लिए इसको एक एक्सपेरिमेंट की तरह लेते हैं। सुबह-सुबह दुनिया में क्या हो रहा है। ये सुबह-सुबह सुनने की ज़रूरत नहीं है हमें। वो भी विजु़अल के साथ। पूरे विश्व में कहाँ-कहाँ क्या हुआ। मीडिया का रोल है वो बताना, जो हो रहा है। वो नहीं बतायेगा कि आपके एरिया में पूरे लोग सब ठीक से सोये। न्यूज़ पेपर में तो यही आयेगा कि कल रात को इस एरिया में एक घर में चोरी हुई। जब हमने उसे एक बार पढ़ा, दो बार पढ़ा तो तीसरी बार कहने लगे कि अभी चोरियां बहुत होने लगी हैं। और चौथी बार कहा कि घर ध्यान से लॉक करो, कहीं चोरी न हो जाये। मीडिया हमें ये सब दिखायेगा, कानों में भी आयेगा और सोशल मीडिया में भी आयेगा लेकिन लेना क्या है, अपने अन्दर भरना क्या है ये च्वाइस हमारी है।
दुनिया में क्या हो रहा है ये सुबह-सुबह जानना हमारे लिए ज़रूरी नहीं है। सुबह-सुबह हमारे लिए ज़रूरी है प्योर, पावरफुल इन्फॉर्मेशन, विज़डम, स्पीरिचुअल नॉलेज, परमात्मा का ज्ञान सुबह-सुबह वो भरेंगे। ये है सही डाइट हमारी आत्मा के लिए। तब अपने आप सोच बदल जायेगी। अच्छे थॉट्स अपने आप आने लगेंगे। जैसे निगेटिव थॉट अपने आप आते हैं वैसे ही प्योर थॉट्स भी अपने आप आने लगेंगे। लेकिन उसके लिए चाहिए प्योर इमोश्नल डाइट। सिर्फ एक हफ्ते के लिए हम वो ही सुनेंगे, देखेंगे, पढ़ेंगे, जैसा हम बनना चाहते हैं। क्योंकि अन्दर जो जायेगा वो ही हम बनेंगे और वो ही हमारे शब्दों में निकलेगा। इसीलिए अपने मन को साफ करते हैं और उसके बाद अच्छी चीज़ें ही अन्दर डालेंगे। पॉजि़टिव सोचना नहीं पड़ेगा, पॉजि़टिव सोच ही सही सोच है।

RELATED ARTICLES

सबसे लोकप्रिय