Homeलेखमन की बातें - राजयोगी सूर्य भाई जी

मन की बातें – राजयोगी सूर्य भाई जी

प्रश्न : मेरा नाम पूर्वी है। मैं 21 साल की हूँ। मुझे झूठ बोलने की बहुत आदत हो गई है। कोई भी सिचुएशन हो, मैं सही भी हूँ तो भी मेरे मुख से झूठ ही निकलता है। मैं इससे छुटकारा पाना चाहती हूँ कृपया बतायें कि मैं इससेे कैसे मुक्त हो सकती हूँ?
उत्तर : ये बहुत अच्छा है कि आप अपनी गलती को महसूस कर रही हैं। आप सत्य के मार्ग पर आना चाहती हैं ये बहुत अच्छी बात है। क्योंकि संसार में झूठ का बोल बाला है परन्तु विजय सत्य की है। झूठ से टेंशन बढ़ रही है, झूठ से पाप बढ़ रहा है। झूठ से अविश्वास बढ़ रहा है। तो इससे तो मनुष्य को मुक्त होना ही चाहिए। अभी आपको इससे बचने के लिए अपने मन में दृढ़ता लानी होगी कि नहीं मुझे अब सत्य के मार्ग पर चलना है। तो मैं आत्मा हूँ इस सत्य से शुरुआत करेंगे। मैं ये शरीर हूँ ये झूठ हो गया। मैं चेतन आत्मा हूँ, अजर अमर अविनाशी हूँ। आत्मा भी सत्य है। तो इस स्वरूप में स्थित होने से सत्य के संस्कार जागृत होते जायेंगे। और बहुत थोड़े समय में मैं तो कहूँगा कि तीन मास आप ये अभ्यास कर लें। स्वमान की प्रैक्टिस हमें महान बनाती है। मैं एक महान आत्मा हूँ, मैं एक पुण्य आत्मा हूँ, मैं धर्मात्मा हूँ, श्रेष्ठ हूँ, पवित्र आत्मा हूँ। इस तरह की फीलिंग में आप रहेंगी तो सत्य नैचुरल रूप से आपके साथ आ जायेगा। और वो आपकी शक्ति बन जायेगा। और दूसरा अगर झूठ बोलने के बाद हम अपनी गलती को रियलाइज़ कर लेते हैं और क्षमा मांग लेते हैं तो इससे भी आप जल्दी निकल जायेंगी।

प्रश्न : मेरा नाम कार्तिक है। मेरी समस्या ये है कि अच्छे से पढऩे के बावजूद भी मैं 12वीं क्लास क्लीयर नहीं कर पा रहा हूँ। इस बार लास्ट चांस है, बस अकाउंट रह जाता है। माँ जी कहती हैं कि तेरी कुंडली में पढ़ाई नहीं है। क्या कुंडली सच होती है? कृपया बतायें मैं ऐसी स्थिति में क्या करूँ?
उत्तर : आप रोज़ सवेरे उठते ही बहुत विश्वास के साथ सात बार संकल्प करेंगे मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ, सफलता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है। और जब एग्ज़ाम देने जा रहे हों तब भी 2-3 बार ये दोहरायें और जब पेपर लिखने लगें तो भी एक बार इस स्वमान की प्रैक्टिस ज़रूर करें। बिल्कुल भी नर्वस नहीं होना है आपको, डर बिल्कुल छोड़ दें। इस बार पता नहीं क्या होगा। अगर इस बार भी फेल हो गए तो गये। तो इसीलिए आपको ऐसा नहीं सोचना है। आप ऐसा सोचें कि इस बार मेरा एग्ज़ाम बिल्कुल क्लीयर होगा, शिवबाबा मेरे साथ है। और साथ में जब तक एग्ज़ाम आयें एक घंटा रोज़ मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ, सफलता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है इस स्वमान के साथ मेडिटेशन अवश्य करें। इससे बाधा भी दूर हो जायेगी और सफलता भी मिलेगी। और शिवबाबा आपको ज़रूर सफलता प्रदान करेंगे। और रही बात कुंडली की तो आपको कुंडली को मानकर बैठ नहीं जाना है। सबकुछ बदलता है। क्योंकि कर्मों के आधार से सबकुछ होता है। अगर आप कर्मों को महान बना लें और अच्छा योगाभ्यास करें तो पास्ट के कार्मिक अकाउंट क्लीयर होने लगेंगे। आपके ये सब इफेक्ट खत्म हो जायेंगे। वो ग्रह रहेगा तो वहीं लेकिन जो भारी था वो धीमा हो जायेगा और कार्य में बाधा नहीं डालेगा।

प्रश्न : मेरा नाम डॉ. महेश है। परमात्मा मुरली में ये कहते हैं कि अंतिम समय में पांचों विकार के रूप होंगे बाकी विकार तो हम समझ सकते हैं लेकिन ये जो मोह है उसको कैसे समझा जाये? कहते हैं कि मोह अपने अति रूप में होगा। आज हम देख रहे हैं कि परिवार टूट रहे है, अटैचमेंट खत्म हो रहे हैं तो इस चीज़ को कैसे समझा जाये?
उत्तर : भगवान ने तो अपने महावाक्यों में ये कह दिया है कि ये अन्तिम पेपर नष्टोमोहा का ही होगा। ये मोह अति सूक्ष्म है। इसको पहचानना इतना सहज काम नहीं है। मुझे भी पचास साल पहले पता चला किसी ने बताया कि आपके अन्दर मोह है। मैंने कहा कि मेरे अन्दर मोह! मुझे दुनिया से लगाव नहीं, मुझे सम्बन्धियों से लगाव नहीं। मेरे अन्दर मोह कहाँ से आया! तो उसने कहा कि नहीं, मोह है। और ये बहुत साल के बाद मुझे रियलाइज़ेशन हुआ कि मोह कितनी सूक्ष्म चीज़ है। कोई व्यक्ति हमारे साथ दस साल से रह रहा है हमें उससे प्यार है। भले ही वो प्यार निगेटिव नहीं है, साथ खाते हैं, साथ घूमने जाते हैं, साथ चर्चायें करते हैं, साथ योगाभ्यास करते हैं। लेकिन एक थोड़ा-सा लगाव अवश्य रहता है। वो व्यक्ति जब हमसे दूर रहता है, 10-20 दिन हमारे साथ न हो तो हमें एक मिसिंग फील अवश्य होती है। अब मोह वस्तुओं में भी हो सकता है और साधनों में भी। अपनी योग्यताओं से भी लगाव हो सकता है। मनुष्यों से भी लगाव हो सकता है। इसको पहचानना भी सूक्ष्म स्थिति है। और इससे दूर होने के लिए देह से डिटैच यानी सॉल कॉन्सेस होने की लम्बे समय तक प्रैक्टिस करनी चाहिए।
तो अन्त में ये ऐसा पेपर आयेगा कि जिस व्यक्ति का जिस वस्तु या व्यक्ति में मोह है वो उसको पकड़ लेगा अंत में। वो मनुष्य को एक डिप्रेशन की स्थिति में ले जायेगा। ये मोह का एक स्वरूप होता है। इसमें एक अच्छे पुरुषार्थ की आवश्यकता है। ये जो घर टूटने की, परिवार टूटने की बात कही इसके पीछे मनुष्य का इगो काम कर रहा है। छोटी-छोटी बातों के कारण लोग अलग होने को तैयार हैं। लेकिन जो मोह है वो तो उनके अन्दर ही है। मतलब ये नहीं कह सकते कि अलग हो रहे हैं तो मोह खत्म हो गया।

RELATED ARTICLES

सबसे लोकप्रिय