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सोच की सुरक्षा…

आज सुरक्षा के मायनों में कितने ऐसे मायने हैं जो अलग-अलग तरह से समाज को इंगित करते हैं। उदाहरण के लिए जैसे आज सभी चाहते हैं कि हमारे घर में सबकुछ बहुत अच्छा चले उसके लिए समय-समय पर, अलग-अलग अवसर पर कुछ न कुछ ऐसे दानपुण्य करते हैं ताकि उसका लाभ सुरक्षा के रूप में हमारे घर को मिले। ऐसी बातों से हम अपने आप को सुरक्षित रखें।
इसके अलावा ज्योतिष, वास्तु और बहुत से ऐसे विज्ञान का उपयोग भी हम करते हैं जो स्थूल रूप में अपने परिवार को स्थूलता के साथ सुरक्षित करते हैं। होना भी चाहिए स्वाभाविक-सी बात है, ज़रूरी है। लेकिन समय बदल रहा है, और इस बदलाव के दौर में आप एक बार नज़र उठाकर देखेंगे तो ऐसे बहुत सारे पहलू और पल नज़र आयेंगे जिसमें हर कोई कर्म तो कर रहा लेकिन डर भी रहा है। और डर इतना समय का, इतना लम्बा है कि उससे निकलने के कई हज़ार तरीके अपनाता है, लेकिन फिर भी किसी न किसी बात में उसे डर लगता ही है। तो ऐसे व्यक्ति का ये सबकुछ करना, समय प्रति समय अपने आपको उन दायरों में ले जाना जो ज़रूरी नहीं है,उसमें जाकर बात करना वो कहाँ तक कामयाब होता है।
फिर बात आती है कुछ लोग सक्षम भी हैं, कुछ लोग असक्षम भी हैं। कुछ लोग ये सारी चीज़ें कर सकते हैं लेकिन कुछ हैं जो कुछ बिल्कुल भी नहीं कर सकते तो फिर उनकी सुरक्षा कैसे? करने वाले असुरक्षित हैं क्योंकि उनके अन्दर ताकत नहीं है। और-और चीज़ें करके उनसे मन भर लेते हैं लेकिन जो दायरे से बिल्कुल ही कटे हुए हैं और जिनके अन्दर बिल्कुल भी दम नहीं है और वो कैसे करेंगे! तो उनके पास एक शक्ति है वो है सोच की शक्ति। क्योंकि सोच में हमारे दान है, सोच में ही पुण्य है, सोच में ही सबकुछ है जो समाज ने हमारे में डाली हुई हैं।
अगर सोच को मूल्यों से, मापदंडों से, सत्यता से, ईमानदारी से भर लिया जाये तो क्या आपको नहीं लगता कि हम सत्यता के आधार से सुरक्षित हो जायेंगे! तो सोच ही हमारा एक ऐसा पहलू है, सोच ही एक ऐसा मुद्दा है हमारे लिए जो हर पल आपको स्थाई रूप से या अस्थाई रूप से सुख देता है। जैसे एक बार हँसी की बात कर लो तो सुख मिल गया, एक बार खुशी की बात कर लो सुख मिल गया। तो सुख कौन दे रहा है? सोच। एक छोटी-सी सोच सुन्दर वातावरण बनाने के लिए कह रही है। एक छोटी-सी सोच एक सुन्दर बात समझने के लिए कह रही है। एक छोटी-सी सोच आपको उन बातों से निकालने में मदद करती है जिन बातों ने आपको उलझाये रखा है।
तो आप सोचिए, दान में बल है, वास्तु में बल है, ज्योतिष में बल है या फिर सोच में बल है? हमारी सोच सुरक्षित कब रहेगी और सही रूप से सोच हम कब पायेंगे? जब हम मूल्यों, नैतिकता और सत्यता के मापदंडों पर चलेंगे तो मूल्यों मापदंडों, सत्यता या गुणों के आधार से की गई सोच ही सुरक्षित है। क्योंकि और-और चीज़ों में कुछ न कुछ मिलावट है। और वो उन लोगों ने बनाया है जो इस समाज में हैं। लेकिन उनको ये सारी बातें पता ही नहीं है कि आध्यात्मिकता में बल है। और आध्यात्मिकता से हम अपने आपको ज्य़ादा सुरक्षित महसूस कर सकते हैं, न कि और चीज़ें करने से।
तो सबसे पहले अपनी सोच को इन बातों से सुरक्षित करना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि जब हम आध्यात्मिक बन भी जाते हैं तो भी ये बीच-बीच में सारी बातें हमारी सोच को डिस्टर्ब करती हैं, परेशान करती हैं। और हम न चाहते हुए भी उन सारी चीज़ों को करने लग जाते हैं कि चलो नहीं-नहीं क्या फर्क पड़ता है। ज्ञानी हो गए तो भी क्या इन सब बातों को करना ज़रूरी है? बिल्कुल ज़रूरी नहीं है क्योंकि उसमें भी सोच थोड़ी देर तो चलेगी ना! अगर थोड़ी देर भी सोच चलती है तो आप अपने साथ न्याय नहीं कर रहे हैं और मिक्सड होना, ये संकल्प भी हो, वो संकल्प भी हो तो सोच हमेशा फ्लक्चुएट होगी। और आप वो नहीं कर पायेंगे जो करना चाहते हैं। तो एक फिक्स्ड आइडिया के साथ कि नहीं संकल्पों में सिर्फ आध्यात्मिकता को डालना है। आध्यात्मिकता के साथ सोचना है, आध्यात्मिकता के साथ बोलना है। नैतिकता, गुण और शक्ति के आधार से ही जीवन जीना है। आप देखो आप निरंतर सुरक्षित रहेंगे, प्रकृति भी आपको सहयोग देगी, लोग भी आपको सहयोग देंगे। और समाज का एक-एक तबका आपकी सराहना करेगा। तो अगर सच में अपने आपको सुरक्षित करना है तो अपनी सोच को सुरक्षित करिए क्योंकि यही सबसे महत्वपूर्ण पहलू है हमारे जीवन का। सोच की सुरक्षा जब हो जाये तो समझो हमारा आगे का सम्पूर्ण जीवन निष्कलंक, सौभाग्यशाली और सुखमय बन जायेगा। फिर सभी आप की सोच से चलने लगेंगे।

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