मूल्यनिष्ठ समाज तो तभी स्थापन हो सकेगा जब कुछ आत्मायें मूल्यों की धारणा का भरसक पुरुषार्थ करके अपने जीवन में मूल्यों को परिपक्व कर देंगे और उसी काल में, अन्य लोग जो मूल्यों की बात पर खिल्ली उड़ाते होंगे या जो पुनर्जन्म की बात मानते ही नहीं होंगे, वे जीवनकाल में दो-चार बार मूल्यों की धारणा का अवसर प्राप्त होने के बाद वे सब सामूहिक रूप से इस धरा-धाम से चले जायेंगे। अवश्य ही कुछ ऐसे विश्वव्यापी वृत्तान्त होंगे जिनके परिणामस्वरूप संसार में आसुरीयता मिट जायेगी और फिर दिव्य चरित्र के लोगों का समाज सजीव और सक्रिय होगा। जैसा बीज होता है, वैसा ही फल होता है। आसुरीयता चीज़ ही ऐसी है कि आखिर उसका फल दुर्घटना, दु:ख अथवा विनाश होता है। यदि बार-बार समझाने और कहने के बावजूद भी कोई बुराई को नहीं छोड़ता और अपने दूषित कर्मों से दूसरों को दु:ख देना बन्द नहीं करता तो आखिर उसकी बुराई उसे ले डूबती है। अत: यदि इस बात को कहा जाये कि मूल्यनिष्ठ समाज के प्रगट होने से पहले संसार में कुछ संकट की घडिय़ाँ आयेंगी और उनके परिणामस्वरूप, पृथ्वी माता के मस्तक से आसुरीयता नाम का काला टीका धुल जायेगा तो किसी को इसे बुरा नहीं मानना चाहिए क्योंकि यह तो संसार का अटल नियम है कि प्रभात होने से पहले रात्रि का अंधकार तो मिटता ही है। इसमें हमारे या अन्य किसी के चाहने या न चाहने की बात नहीं है बल्कि यह तो नियम ही है कि नैतिक मूल्यों के अभाव से, दुर्बुद्धि अथवा विपरीत बुद्धि वाले लोग अपने हाथों स्वयं विनाश को लाते ही हैं। अभिमान, क्रोध, घृणा, द्वेष, हिंसा से पागल हुए लोग यह भी नहीं समझते कि यदि आणविक अस्त्र बनाकर और प्रकृति की हरियाली को नष्ट करके, कामान्ध होकर निम्न कोटि के पशुओं की तरह बहु सन्तान उत्पन्न करके, बड़े-बड़े कारखानों और व्यापारों द्वारा भोगवाद को बढ़ावा देने वाले कार्यो में प्रवृत्त होकर, निर्धनों का शोषण करके, उनके बच्चों को बिलबिलाने पर मजबूर करना, गोया सबको मुख से आह निकाल कर, विनाश की ज्वाला प्रगट करना ही है।
साथ ही साथ अन्य लोग सात्विकता, सरलता, नम्रता, स्नेह, सन्तुष्टता इत्यादि दिव्यगुणों को धारण करके, दिव्यगुणों के समाज की नींव डालेंगे और पुनर्जन्म लेकर देवी-देवताओं के उस मूल्यनिष्ठ समाज के सदस्य बनेंगे जिसे कि ”सतयुगी समाज”कहा जाता है। वे योगाभ्यास करते हुए अपने मन, बुद्धि और संस्कारों को मूल्यनिष्ठ बनायेंगे अथवा उनका सशक्तिकरण करेंगे जिसके फलस्वरूप ही वे सतयुग में प्रवेश करेंगे। स्पष्ट है कि मूल्यनिष्ठ समाज की स्थापना पुनर्जन्मवाद पर आधारित है। यदि पुनर्जन्म होता ही है न हो या पुन: अस्तित्व रहता ही न हो तब तो सब मिथ्या हो जाता है। दूसरे, उस समाज की स्थापना से पहले, आसुरीयता का विनाश भी ज़रूरी है। मूल्यों की धारणा मूल्यनिष्ठ समाज के प्रगट होने से पहले होगी।
कुछ लोगों से जब हम पूछते हैं कि मूल्यनिष्ठ समाज कैसा समाज होगा तो वे कहते हैं कि उस समाज में सहनशीलता होगी और लोगों में साहस, करुणा, दयाभाव, दानशीलता, सहानुभूति इत्यादि मूल्य होंगे। परन्तु वे अपने इस कथनोपतन के निष्कर्ष को समझते नहीं हैं। उदाहरण के तौर पर सोचने की बात है कि यदि किसी में साहस होगा तब उसका भाव तो यह निकलता है कि मूल्यनिष्ठ समाज में कोई भयप्रद परिस्थितियाँ होंगी अथवा धन, जीवन, नाम, परिवार, सम्पत्ति इत्यादि की कोई खतरे की हालत होगी जिससे कि वो घबरायेगा नहीं वरना ”साहस” शब्द का कुछ अर्थ ही नहीं निकलता। अगर कोई घबराहट की परिस्थिति है तब तो इसका यह अर्थ निकलता है कि उस मूल्यनिष्ठ समाज में भी कई ऐसे लोग होंगे अथवा कई ऐसी प्राकृतिक परिस्थितियाँ आती होंगी जो जन साधारण के लिए भयावह होंगी और कुछ व्यक्ति साहस करते होंगे।
इसी प्रकार, करुणा, दया, कृपाशीलता नाम वाले दिव्यगुणों का भाव यह निकलता है कि मूल्यनिष्ठ समाज में ऐसे भी लोग होंगे, जिसे देखकर मन द्रवित हो उठेगा। ऐसी स्थिति क्यों होगी? इसी प्रकार, यदि यह कहा जाये कि मूल्यनिष्ठ समाज में क्रसहनशीलताञ्ज होगी तब इसका भाव तो यह निकलता है कि उस समाज में कुछ ऐसे लोग भी होंगे जो अपमान, क्रोध, घृणा इत्यादि का व्यवहार करते होंगे और अन्य लोग उसे सहन करते होंगे। यदि उस समाज में न कोई अपमान करता, न क्रोध, न घृणा, न द्वेष तो फिर सहनशीलता का प्रश्न कहाँ उठता है? इन बातों से स्पष्ट है कि इन सब मूल्यों अथवा गुणों की धारणा का अभ्यास पहले ही हो चुका होगा और उनकी हमारे जीवन में परिपक्वता हो चुकी होगी जिसके फलस्वरूप मूल्यनिष्ठ समाज की स्थापना होगी जिसमें ऐसे लोग ही नहीं होंगे जो अपनी नैतिक भ्रष्टता के कारण समाज के वातावरण को दूषित करें और दूसरों को उत्पीडि़त करें और इसी अन्तरकाल में आसुरीयता, विश्व विध्वंसकारी साधनों से स्वयं को मलियामेट कर चुकी होगी।

