बूढ़ी माँ और बेटा

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यह कहानी है बेंगलुरू में रहने वाले रमेश की। रमेश अपने परिवार के साथ बैंगलोर में रहा करता था। परिवार में रमेश की माँ और रमेश की पत्नी तथा दो बच्चे भी रहा करते थे। रमेश की माँ सावित्री बहुत ही बूढ़ी हो चुकी थी और अपने पति के गुजर जाने के बाद बहुत अकेली भी। रमेश एक अमीर आदमी था पर वह अपनी माँ के इस बुढ़ापे की उम्र में उनकी ज़रूरतों को समझ पाने में असमर्थ था। वह भौतिक ज़रूरतें पूरी कर पाता था मगर इमोशनल स्पोर्ट नहीं दे पाता था, जिसकी उसकी माँ को इस उम्र में बहुत ज़रूरत थी। रमेश का घर चार मंजि़ल का था। उसने अपनी माता के लिए तीसरे मंजि़ल में कमरा तैयार कर रखा था। उस कमरे में सारी सुख-सुविधाएं थी। सभी सुख-सुविधा होने के बावजूद भी उसकी माँ हमेशा परेशान और मायूस रहा करती थी। वह अकेली रहती थी उसके साथ बात करने वाला कोई नहीं था, वह अपने परिवार का साथ चाहती थी। पर यह बात रमेश को समझ नहीं आ रही थी। रमेश और उसकी पत्नी लीला को यह लगता था कि हम तो अपनी बूढ़ी माँ को सारी सुख-सुविधाएं उपलब्ध करवाते हैं। किसी चीज़ की कोई कमी नहीं है फिर भी यह सासू माँ हमेशा ही नाराज़, परेशान और ना खुश क्यों रहती है, अक्सर इस बुढ़ापे में वह हमसे क्या चाहती हैं? ऐसा सावित्री की बहू लीला ने सोचा। एक दिन सावित्री ने अपने बेटे रमेश से जि़द्द की कि उसका बिस्तर पहली मंजि़ल में लगवा दे। माँ के कई दफा कहने पर रमेश ने उनका बिस्तर नीचे मंजि़ल में लगवा दिया। अब सावित्री नीचे मंजि़ल में खुश रहने लगी। उसके स्वभाव में बेहद परिवर्तन आने लगा। यह देख रमेश हैरान हुआ कि ऊपर तीसरी मंजि़ल में भी उन्हें हर एक सुख-सुविधा मैंने दे रखी थी। फिर भी वह हमेशा नाखुश और डिप्रेस्ड रहती थी। पर यह ऐसा क्या हुआ जो अब माँ हंसने लगी है, खुश रहने लगी है। दरअसल सावित्री की खुशी का राज़ पहली मंजि़ल में अपने पोते-पोतियों को आते-जाते देख और उनके साथ खेल पाने की थी। यह खुशी उसे तीसरी मंजि़ल में रहकर नहीं मिलती थी क्योंकि वहाँ बच्चों का और परिवार का आना-जाना बहुत कम था और वो ना ही इतनी सीढिय़ां चढ़-उतर सकती थी। अब सावित्री के पोते-पोतियां भी उसके साथ खेलते थे। उनके साथ खेलते-खेलते अब वह धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगी और सावित्री के चेहरे पर पहले जैसी खुशी वापस आने लगी। वह अपने बच्चों के लिए कभी पकोडिय़ां तो कभी मालपुए बनाया करती थी। अब बच्चे भी अपनी दादी के साथ खुश रहने लगे। यह सब देख रमेश आश्चर्यचकित रह गया कि माँ की तबीयत में इतना सुधार आखिर कैसे? जो यह महंगी-मंहगी दवाईयां न कर पाई बल्कि परिवार के साथ थोड़ा-सा समय बिताने पर ही उनकी सेहत में बहुत ज्य़ादा सुधार दिखने लगा। अब वह यह बात समझ गया कि बुढ़ापे में हमें भौतिक सुख-सुविधाओं से ज्य़ादा अपनों का प्यार और अपने परिवार के साथ की ज़रूरत होती है। बूढ़े और बच्चे एक समान होते हैं उन्हें बच्चों की तरह प्यार और देखभाल की आवश्यकता होती है। रमेश को अपने किए पर पछतावा हुआ, उसे घमंड था कि वह तो अपनी माँ को हर एक सुख-सुविधा देता है। पर इस भौतिक सुविधाओं के दिखावे के चक्कर में वह अपनी माँ को असली सुख-सुविधा देना भूल गया था जो था अपने माता-पिता का बुढ़ापे में हाथ थामना जैसे उन्होंने बचपन में हमारा थामा था। सीख : बुजुर्ग इस उम्र में अक्सर अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं और इस वजह से उन्हें कई सारी मानसिक बीमारियों का सामना भी करना पड़ सकता है इसलिए उन्हें भौतिक सुख के साथ-साथ परिवार का प्यार और बुढ़ापे में एक इमोशनल स्पोर्ट की ज़रूरत होती है।

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