मुख पृष्ठब्र.कु. उषापरमात्म परवरिश आज भी हमें नसीब है…

परमात्म परवरिश आज भी हमें नसीब है…

देने वाला, करनकरावनहार बाबा करायेगा आपसे। इसलिए जितना भरपूर हम अपने आपको करेंगे उतना ही हम उस समय में ये रोल प्ले कर सकेंगे। आपके पास सिर्फ खड़े होने से भी जैसे कुछ मिल रहा है ये फीलिंग आयेगी।

पिछले अंक में आपने पढ़ा कि अभी भी सूक्ष्म पालना हमारी कौन कर रहा है? वो ब्रह्मा माँ कर रही है। इसीलिए बाबा ने कहा कि वो बाप भी है तो माँ भी है। तो उस माँ के द्वारा पोषण भी अभी तक प्राप्त हो रहा है। ये पोषण मिलना यही सकाश है। तो एक तो योग लगाकर शिवबाबा से डायरेक्ट हम ले रहे हैं। दूसरा ब्राह्मण होने के नाते ब्रह्मा माँ से परवरिश ले रहे हैं। तो दोनों तरफ सकाश प्राप्त हो रही है। शक्ति प्राप्त हो रही है। जिस शक्ति से ही हम दूसरी आत्माओं को भी सहयोग दे सकेंगे। अब आगे पढ़ेंगे…
ये शक्ति क्या काम करेगी। बाबा कहते, अन्तिम समय अनेक आत्मायें आपके सामने आयेंगी कि हमें कुछ अंचलि दे दो, थोड़ी-सी शांति दे दो। थोड़ा-सा हमें प्यार दे दो। थोड़ी हमें शक्ति दे दो। उनके अन्दर उमंग-उत्साह भरना, उनको शांति का दान देना ये हमारा कत्र्तव्य है। तो तने के साथ जितना हमारा कनेक्शन होगा और ऊपर से तो दोनों तरफ से हमें सकाश प्राप्त हो जाती है। उस सकाश से इतनी शक्ति भरेंगे तो उस समय जो आयेंगे, हम आत्मिक स्थिति में होंगे और वो आत्मा वो चीज़ ले जायेगी हमारे से, जो उनको चाहिए। उनको शांति चाहिए वो शांति ले जायेंगी, उनको खुशी चाहिए खुशी ले जायेंगी। उनको प्यार की अनुभूति करनी है तो परमात्म प्यार का अनुभव करके जायेंगी। जो चाहिए उनको हमारे द्वारा प्राप्त होगा। और तब बाबा हमें निमित्त बनाकर हमसे दिलायेगा। मैं दे रही हूँ ये भान नहीं आयेगा। क्योंकि हमें पता भी नहीं चलेगा कि वो बाबा ने उसको क्या दिया और वो क्या लेकर गया। ये भी पता नहीं चलेगा। क्योंकि देने वाला, करनकरावनहार बाबा करायेगा आपसे। इसलिए जितना भरपूर हम अपने आपको करेंगे उतना ही हम उस समय में ये रोल प्ले कर सकेंगे। आपके पास सिर्फ खड़े होने से भी जैसे कुछ मिल रहा है ये फीलिंग आयेगी।
जैसे अभी कभी-कभी हम जाते हैं कहीं, किसी ने शरीर छोड़ा होता है और वहाँ का माहौल ये होता है, जैसे वहाँ जाकर बैठते हैं तो पूरी सभा में क्या होता है शांति हो जाती है। वो भी कहते हैं कल फिर आना आप, वो कहते हैं कि आप आते हैं ना तो अच्छा लगता है हमें। तो थोड़ी सी अंचलि मिली ना अभी तो। तो ये अनुभव कराने वाला कौन है? बाबा ने हमें निमित्त बनाकर वहाँ पहुंचाया, बिठाया और उनको क्या दिला दिया वो मालूम नहीं। उनको खुद नहीं मालूम। बस कहते हैं कि अच्छा लगा आप आये।
तो इसीलिए बाबा से जब सकाश लेकर अपने आप को भरपूर करेंगे तब ऐसे दे सकेंगे। तने के साथ झाड़ को हमेशा याद रखो। मैं तने में हूँ, ब्रह्मा माँ से वो पोषण ले रही हूँ और शिव बाप से शक्ति ले रही हूँ। दोनों तरफ से हमारी परवरिश हो रही है। तो झाड़ के चित्र को हमेशा याद रखो। स्मृति में रखो कि जिस तरह ब्रह्मा बाबा ऊपर खड़े हैं मैं भी ऐसे बाबा के पास खड़ी हूँ, ये देखो। और नीचे जहाँ बाबा-मम्मा बैठे हैं वहाँ मैं भी बीच में बैठी हूँ। मैं दोनों से पालना ले रही हूँ। पोषण ले रही हूँ, परवरिश ले रही हूँ और अपने आपको भरपूर कर रही हूँ। ये भी सकाश है। फिर पाँचवी बात सकाश लेना माना जो बाबा कभी-कभी कहता है टॉवर बन जाओ। शांति के टॉवर बन जाओ। तो शांति स्तम्भ को हमेशा बाबा ने ये जब कहा था मुरली के अन्दर बच्चे चार धाम की यात्रा अमृतवेले करो। जहाँ भी आप अपने स्थान पर हैं लेकिन बुद्धि से तो आप चार धाम कर सकते हैं ना! मधुबन में रोज़ चक्कर लगाकर चार धाम की यात्रा करते हैं ना, कि नहीं करते। या कभी-कभी याद आ जाती है कि चार धाम का चक्कर लगाना है। क्या करते हैं? कभी-कभी नहीं अभी रोज़ करना। और रोज़ शांति स्तम्भ पर ज़रूर जाना। बाबा शांति का टॉवर है, पवित्रता का टॉवर है। शक्ति का टॉवर है, ज्ञान का टॉवर है। ऐसे मुझे भी शांति का टॉवर, पवित्रता का टॉवर, शक्ति का टॉवर, ज्ञान का टॉवर बनना है। यानी उसकी हाइएस्ट स्टेज में अपने आप को स्थित करना है।

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