आपकी सोच… सामाजिक स्वास्थ्य पर भी असर डालती

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सोच, सिर्फ सोच नहीं है, अपितु सोचने से उसके होने वाले परिणाम बड़े गहरे हैं। हर व्यक्ति सोचता है, भले चाहे वो कहीं पर भी है, बैठा है, कार्य करता है, चलता है, फिरता है, तब भी वो मन में कुछ सोचता ज़रूर है। ज्य़ादा सोचने के कारण कई-कई तो नींद में भी सोचने, चिल्लाने के शिकार होते हैं। इसी को देखते हुए वल्र्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन(डब्ल्यू.एच.ओ.) ने स्वास्थ्य को पारिभाषित करते हुए कहा है कि स्वास्थ्य में शारीरिक पहलू के अतिरिक्त मनुष्य का मानसिक, नैतिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य भी शामिल है।
ज़रा सोचिए, आप यूं ही सोच रहे हैं, लेकिन उससे उत्पन्न होने वाला प्रभाव सबसे पहले हमारे स्वास्थ्य पर पड़ता है। 70 प्रतिशत से भी अधिक रोग मानसिक कारणों से होते हैं। दूसरे शब्दों में वे ये कहते हैं कि बहुत से शारीरिक रोग जैसे कि रक्तचाप(हाई ब्लड प्रेशर), पेट में रसौली(पेप्टिक अल्सर), दमा(अस्थमा), जोड़ों में दर्द(अर्थराइटिस), हृदय रोग, यहां तक कि कैंसर आदि रोग भी मानसिक तनाव(मेंटल टेंशन), चिंता, ईष्र्या, द्वेष और घृणा की सूक्ष्माग्नि जैसे मानसिक कारणों से होते हैं। अत: डब्ल्यूएचओ इसको महसूस करता है कि मनुष्य के व्यक्तिगत लक्षणों, उसकी जीवन-पद्धति(लाइफ स्टाइल) आदि से भी उसके शारीरिक रोगों का सम्बंध है क्योंकि मनुष्य के जीवन के अनुभव अथवा उसके व्यवहार की दिव्यता या आसुरयता उसके शरीर पर अच्छा या बुरा प्रभाव डालते हुए उसे स्वस्थ बनाये रखती है या अस्वस्थ कर देती है। इसी को सामने रखते हुए विश्व स्वास्थ्य संघ ने स्वास्थ्य की परिभाषा करते हुए कहा है कि स्वास्थ्य में शारीरिक पहलू के अतिरिक्त मनुष्य का मानसिक, नैतिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य भी शामिल है।
यहां तक तो बात ठीक है परंतु हम अपने दैनिक जीवन में देखते हैं कि डॉक्टर्स के पास समय इतना कम होता है और रोगियों की भीड़ इतनी ज्य़ादा कि वे रोगी के केवल रोग-चिन्हों पर ध्यान देते हुए उन्हें केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए ही औषधि दे पाते हैं। रोगी में अधिक जल्दबाज़ी की आदत, चिंता का स्वभाव, बात-बात में तनाव हो जाने की टेव, ईष्र्या-द्वेष में जलते-भुनते रहने का कुसंस्कार, घर वालों तथा अड़ोसी-पड़ोसी से मेलमिलाप की बजाय अनबन और मनमुटाव बनाये रखने की जीवनशैली इत्यादि को ठीक करने के लिए वे न तो रोगी को कोई उपाय बताते हैं, न उसकी पूरी बात सुनकर रोग के इन कारणों से अवगत ही करा पाते हैं और न रोगी ही किसी ऐसी अपेक्षा को लेकर डॉक्टर के पास जाता है। डॉक्टर की ओर से यहां यही प्रयास होता है कि रोगी को ऐसी औषधि दी जाए जिससे उसे तुरंत राहत मिले और उसके इन रोग-चिन्हों का विलोप हो जाए। रोगी डॉक्टर के मात्र इतने ही प्रयास से संतुष्ट होकर, डॉक्टर को सप्रणाम भेंट चढ़ाकर अपने काम में लग जाता है।
औद्योगिक सभ्यता और तकनीकी संस्कृति के इस कलिकाल में जबकि हर व्यक्ति उसके अभाव के कारण बेतहाशा भाग रहा है और फिर भी उसके कई काम पूरे नहीं हो पाते, तब किसी के पास इतना समय ही कहां है कि वो रोग को जड़ से समाप्त करने की ओर ध्यान दे। इसका परिणाम ये होता है कि रोग को जन्म देने वाले स्वभाव, संस्कार, आदतें, जीवन-पद्धति वही बने रहने के कारण कुछ काल के बाद वही या अन्य कोई रोग उत्पन्न हो जाते।
व्यक्ति के मानसिक रोग के कारण उसे शारीरिक रोग होने की बात हमने कही। इसे तो आज चिकित्सक वर्ग और जन मानस मानने लगा है। परंतु इससे भी अधिक कष्टकारी परिणाम, जो मानसिक तनाव या अन्य मानसिक कारणों से होते हैं, उनकी ओर शायद किसी विरले ही का ध्यान जाता है। वह यह कि व्यक्ति अपने मानसिक कारणों से स्वयं तो शारीरिक एवं मानसिक दु:ख पाता ही है परंतु वो अपनी इन मानसिक विक्षिप्तता से दूसरों को भी पीडि़त करता है। उदाहरण के तौर पर मानसिक तनाव वाला व्यक्ति स्वयं तो पूर्वकथित रोगों से पीडि़त होता ही है, परंतु तनाव में आकर जब वो अपमान जनक, उत्तेजित और उक्साहट पैदा करने वाले वचनों को बोलता है अथवा वो विध्वंश या हिंसा कार्यों में प्रवृत्त होता है, तब वो अन्य अनेकों के मन में तनाव पैदा कर देता है, और उसमें भी तनाव जनित रोग उनके द्वार के निकट खड़े करता है। वो न जाने कितनों के मन में चिंता या भय पैदा करता है। क्रोध को जन्म देता है अथवा उनका रक्तचाप बढ़ा देता है। मानसिक रोग का ये सामाजिक पक्ष बहुत भयावह है क्योंकि ये उन अनेकों के जीवन को दु:खमय बनाता है। शारीरिक रोग तो केवल उसी रोगी के लिए कष्टकारक होता है और केवल कुछ ही लोगों के लिए तनिक असुविधा पैदा करता है परंतु ये मानसिक रोग तो समाज में ही उथल-पुथल पैदा कर देते हैं, खलबली मचा देते हैं, सामाजिक शांति को भंग करते हैं और सारे संसार को ही नर्क बना देते हैं।
ज़रा सोचें और सोचकर सोचिए कि हमारी एक सोच क्रन सिर्फ सोचञ्ज है अपितु सोच से स्वयं का स्वास्थ्य तथा उसका प्रभाव सामाजिक स्वास्थ्य को भी बिगाडऩे का कारण बनता है। इसीलिए परमात्मा का कहना है, शुभ-शुभ सोचो जिससे स्व के साथ सबका कल्याण हो।

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