योग अवस्था ही परमात्म प्रेरणा प्राप्त करने का स्रोत

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जबकि दैवीगुणों से सजना ही मनुष्य का लक्ष्य है तो योग की तार को न टूटने देना ही मनुष्य का कत्र्तव्य है। उसमें ही कल्याण है। मनुष्य इस गुह्य भेद को जानते ही नहीं कि सूक्ष्म आत्मा सूक्ष्म परमात्मा के पास अपनी याद मन या बुद्धियोग ही के अव्यक्त रास्ते से भेज सकती है।

हर कोई चाहता है कि हम परमात्म पे्ररणा प्राप्त करें। इसके लिए वो विभिन्न तरीके भी आज़माता है। किंतु योग अवस्था में रहना ही मानो परमात्मा की प्रेरणा का पूरा पालन करना है। आज सारी दुनिया बुद्धिमानों की राय, मत पर चलना चाहती है परंतु बुद्धिमानों की बुद्धि, बुद्धिदाता जो परमात्मा हैं उनकी राय पर चलने की तो एकमात्र युक्ति है ही योगयुक्त अवस्था को धारण करना। क्योंकि उस अवस्था में स्थित हुए बिना कोई मनुष्य परमात्मा की प्रेरणा ले ही नहीं सकता है। योग को दूसरे सरल शब्दों में क्रयादञ्ज भी कहते हैं। परमात्मा की याद सदा बनी रहे, अर्थात् उनकी प्रेरणा व संकेत के अनुरूप अवस्था और व्यवस्था बनी रहे।
व्यक्त भाव में अर्थात् देहभान में तो माया पाँच विकारों का भी प्रवेश होता है, अत: पूर्ण निर्दोष बनने के लिए अपनी शांत और अंतर्मुखी अर्थात् योगयुक्त अवस्था में स्थित रहना चाहिए। क्योंकि परमपिता परमात्मा सूक्ष्म आकार में जिस देश के निवासी हैं उसमें है ही अंतर्मुखता और शांति का प्रभाव। जब मनुष्य आत्मा उस अव्यक्त अवस्था में टिककर वाणी बोलेगी तो उसके वाक्य यथार्थ और सत्य ही निकलेंगे। और उसकी मानसिक अवस्था से मधु के समान मिठास अथवा कस्तुरी के समान खुशबू आयेगी। जबकि दैवीगुणों से सजना ही मनुष्य का लक्ष्य है तो योग की तार को न टूटने देना ही मनुष्य का कत्र्तव्य है। इसी योग युक्त अवस्था के रास्ते से ही तो मनुष्य आत्मा अव्यक्त मूर्त परमात्मा के अव्यक्त धाम की यात्रा कर सकेगी। सूक्ष्म को सूक्ष्म रीति से ही पाया जा सकता है। कर्मातीत अवस्था को कर्मातीत बनने के अभ्यास से ही तो प्राप्त किया जा सकता है। अतएव योगयुक्त अवस्था की टेव डालना ही सच्चे पुरूषार्थ का वास्तविक पुरूषार्थ है।

योगयुक्त अवस्था ही तो कवच है
योगयुक्त अवस्था ही तो कवच है, क्योंकि ये माया के सभी वारों से बचाने का काम करता है। अब इस मायापुरी का वातावरण तो है ही तमोप्रधान। इस कारण योगयुक्त अवस्था में रहने से ही हर हालत में बचाव और कल्याण है। क्योंकि इस सर्वोत्तम अवस्था से ही मनुष्य आत्मा यहां ही मानो सूक्ष्म देश के जैसा वातावरण बना सकेगी। इसलिए सदा योगी को योग की कुटिया में गुप्त तपस्या करते ही रहना चाहिए।

योगाभ्यास से ही याद भेजना संभव है
इस अव्यक्त योगयुक्त अवस्था से ही मनुष्य परमपिता परमात्मा की ओर अपनी याद परमधाम तक भेज सकता है। क्योंकि जो जितना सूक्ष्म है, वह क्रतंतु बिना तारञ्ज के रास्ते शीघ्र ही अव्यक्त स्वरूप परमात्मा के पास पहुंचता है। व्यक्त तो व्यक्त देश में ही प्रत्यक्ष होता है। परंतु सूक्ष्म में तो फिर भी सूक्ष्म ही प्रकट होता है। अब दुनिया वाले तो व्यक्ति(देह इत्यादि) के भान में आकर परमात्मा को अनेक व्यक्त यज्ञ, जप, तप, पूजा, पाठ आदि के तरीकों से पाने का अयथार्थ पुरूषार्थ करते हैं। क्योंकि वे इस गुह्य भेद को जानते ही नहीं कि सूक्ष्म आत्मा सूक्ष्म परमात्मा के पास अपनी याद मन या बुद्धियोग ही के अव्यक्त रास्ते से भेज सकती है। इस गुह्य युक्ति से अपरिचित होने के कारण अनेकों को उस अनोखे जीवन का अनुभव ही नहीं है जो कि योगावस्था अथवा अव्यक्तावस्था में स्थित होने वाली आत्माओं को अब परमपिता परमात्मा द्वारा अनुभव हो रहा है। अत: अब जो कोई भी योग अर्थात् अव्यक्त प्रभु की अव्यक्त याद गंवा बैठता है वह अपनी ही कमाई में घाटा डालता है। मानो कि वह अभी पूरा सजग नहीं हुुआ है, या उसे अभी इस अविनाशी कमाई की खुमारी चढ़ी ही नहीं है।
जैसे हमने बताया, मनुष्य आत्मा परमात्मा को पाने की जो विधि अपनाती है, वह स्थूल है। जबकि परमपिता परमात्मा सूक्ष्मातिसूक्ष्म हैं, तो हमें भी अपने वास्तविक, सूक्ष्म व अव्यक्त रूप को न सिर्फ जानना अपितु उस स्वरूप में स्थित रहकर सूक्ष्म परमात्मा से मिलन मनाना है। ये गुह्य रहस्य व विधि आज हम न अपनाने के कारण, न परमात्मा से मिलन मना सकते, न ही उनसे प्रेरणा प्राप्त कर सकते। योगयुक्त अवस्था ही इस गुह्य रहस्य, गुत्थी को सुलझाकर परमात्मा तक अपनी बात व भाव पहुंचा सकती है और उनसे प्रेरणा प्राप्त कर सकती है

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