मुख पृष्ठब्र.कु. गीतानिश्चय हो तभी तो आचरण में आये

निश्चय हो तभी तो आचरण में आये

जो चीज़ आचरण में ला ही नहीं सकते तो वो बात बाबा क्यों बोलते? हम सबको ये निश्चय हो कि जो बाबा कहते हैं वो सत्य है और कल्याणकारी है। जब ये निश्चय हमें हो जाता है तब हमारी बुद्धि का भटकना समाप्त हो जाता है।

बाबा के ज्ञान की हर बात, बाबा का ज्ञान हमारे सामने मुरली के स्वरूप में है। ज्ञान की हर बात को हमें यथार्थ रूप में समझना है। क्योंकि समझने से वो हमारी बुद्धि में छप जाती है। जब हम स्कूल में पढ़ते हैं तो सबसे पहली बात जब टीचर पढ़ाते हैं उस समय हमें अटेन्शन से पढऩा होता है। हरेक को अपने स्टूडेंट लाइफ का अनुभव होगा कि जब टीचर पढ़ाते हैं उस समय से हम अटेन्शन से पढ़ते हैं तो वो एकदम क्लियर हो जाता है, बुद्धि में छप जाता है। जो स्कूल में क्लास में अटेन्शन से नहीं पढ़ते जिसके लिए कहते हैं कि शरीर से तो क्लास में होते हैं लेकिन मन बाहर होता है। अगर क्लास के टाइम टीचर से योग नहीं है, मुरली में आता है ना कि टीचर से योग चाहिए इसका अर्थ है कि टीचर जब पढ़ाते हैं तो उस समय हमें अटेन्शन से पढऩा है। अगर उस समय अटेन्शन से नहीं पढ़ते तो अनुभव होगा कि बाद में कितनी बार पढ़ते हैं लेकिन वो क्लियरिटी(स्पष्टता) नहीं होती जो जब टीचर पढ़ाते हैं और ध्यान देने से होती है। इसलिए पहली बात है अटेन्शन।
दूसरी बात है कि स्कूल में टीचर पढ़ाते हैं और उस समय हम पढ़ते हैं केवल उतना पढऩे से स्टूडेंट फस्र्ट नम्बर नहीं ले सकता, लेकिन स्कूल में टीचर जो पढ़ाते हैं वो पढऩे के बाद जो स्टूडेंट घर जाकर होमवर्क करते हैं, उस होमवर्क को एक्यूरेट करते हैं मतलब टीचर ने जो पढ़ाया उस पर जो स्टूडेंट व्यक्तिगत मेहनत करते हैं वो स्टूडेंट फस्र्ट नम्बर, फस्र्ट क्लास ले सकते हैं। ठीक वैसे ही ये आध्यात्मिक पढ़ाई, बाबा के ज्ञान की बातें केवल सुनने की होती तो बाबा इसको विद्यालय क्यों कहते! बाबा क्यों कहते हैं कि मैं तुम्हारा परम शिक्षक हूँ, ये स्पिरिचुअल यूनिवर्सिटी है। सिर्फ परिवार का रूप रखता, सिर्फ सत्संग का स्वरूप रखता लेकिन बाबा ने इसको स्पिरिचुअल यूनिवर्सिटी कहा, मतलब हम जो बातें सुनते हैं वो समझनी हैं, स्मृति में रखनी हैं। वो हमारे दिल-दिमाग में छपी हुई होनी चाहिए। इसलिए बाबा से योग, बाबा के प्रति अटेन्शन होना ज़रूरी है। और वो अटेन्शन तभी रहेगा, देखो दुनिया में आपका कोई प्रिय व्यक्ति कैसी भी बात आपको कहेगा वो आपको अच्छी लगेगी, स्वीकार्य हो जायेगी। और जिससे आपका प्यार नहीं वो आपके कल्याण की बात भी कहेंगे तो भी वो आपको स्वीकार्य नहीं होगी। तो बाबा से प्यार, बाबा से योग ये बहुत ज़रूरी है और मुरली के समय इसलिए बाबा सदा हमें बताते हैं कि कैसे हमें मुरली सुननी है। बाबा एक ही शब्द में रोज़ हमें अटेंटिव(सचेत) करते हैं। बाबा कहते हैं कि जब बाबा के सामने बैठते हो तो ज्ञान स्वरूप होकर बैठो। आत्मभिमानी स्थिति में बैठो। बाप के सामने ऐसे ही आकर नहीं बैठ जाओ, जैसे कि नियम से आकर बैठ गये क्लास में। वो भी अच्छी बात है लेकिन अगर ज्ञान मुझे आचरण में लाना है तो ऐसे ही आकर बैठने से नहीं चलेगा। हमें लक्ष्यपूर्वक आना होगा। और अपनी आत्मभिमानी स्थिति में बैठना होगा कि स्वयं भगवान मुझ आत्मा को पढ़ा रहे हैं। स्वयं भगवान के महावाक्य मैं सुन रही हूँ या रहा हँू। इस स्मृति, अनुभूति और स्थिति के साथ बाबा के महावाक्य हमें सुनने और समझने हैं। कई बार हम सुनते हैं, बाबा की बातों को समझते हैं लेकिन हम खुद लॉजिकली विवेक से बाबा की बातों से कन्विंस(मानना) नहीं होते। जिसको बाबा सरल शब्दों में कहते हैं कि सुनना, समझना, मानना, स्वीकार करना और निश्चय करना कि जो बाबा ने कहा वो सत्य है, कल्याणकारी है और जीवन में धारण करना सम्भव है तब बाबा ने कहा है।
कई बार हम अपना तर्क चलाते हैं कि बाबा जो कहते हैं बात तो सही है लेकिन जीवन में धारण करना बड़ा मुश्किल है। हम तो दुनिया में रहते हैं ना, गृहस्थी में रहते हैं ना तो आचरण में लाना कितना मुश्किल है। इस प्रकार हम अपना तर्क चलाते हैं और ये समझते हैं कि आप बहनें तो सेंटर पर रहती हैं, समर्पित हैं और झंझट आपको नहीं है इसलिए तो आप धारण कर सकते हैं लेकिन हम लोगों के लिए बहुत मुश्किल है। वास्तव में हमें विवेक से इस बात को समझना चाहिए कि कैसे बाबा प्रवृत्ति मार्ग के संसार के लिए ज्ञान देते हैं। क्योंकि संसार अनादि काल से प्रवृत्ति मार्ग का ही बना हुआ है, निवृत्ति मार्ग का नहीं। और बाबा भी इस संसार में स्वर्ग लाना चाहते हैं। प्रवृत्ति में पवित्रता स्थापन करना चाहते हैं। तो बाबा जब हम बच्चों को ज्ञान देते हैं तो ज़रूर बाबा को पता है ना कि हम गृहस्थ में हैं, हम कलियुगी दुनिया में हैं और ये जानते हुए भी बाबा हम बच्चों को कहते हैं इसका अर्थ यही हुआ ना कि ज़रूर हमारा जीवन में धारण करना पॉसिबल है तब तो बाबा कहते हैं। जो चीज़ आचरण में ला ही नहीं सकते तो वो बात बाबा क्यों बोलते? हम सबको ये निश्चय हो कि जो बाबा कहते हैं वो सत्य है और कल्याणकारी है। जब ये निश्चय हमें हो जाता है तब हमारी बुद्धि का भटकना समाप्त हो जाता है। हमारा एक मन्दिर से दूसरे मन्दिर में, एक सत्संग से दूसरे सत्संग में, एक गुरू से दूसरे गुरू में, एक शास्त्र से दूसरे शास्त्र में भटकना समाप्त हो जाता है। मतलब भक्ति हमारी पूरी हो जाती है। इसको कहते हैं निश्चय। तो सुनना, समझना और फिर है स्वीकार करना, ये बहुत ज़रूरी है।

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