मुख पृष्ठओम शांति मीडियाकिसी दूसरे पर डिपेंड होने के बजाए बाबा पर डिपेंड करो …

किसी दूसरे पर डिपेंड होने के बजाए बाबा पर डिपेंड करो …

सृष्टि के साथ-साथ जीवन चक्र भी परिवर्तनशील है। अभी मेरी बैटरी फुल होती जा रही है, ऐसा तो नहीं आज फुल नशा चढ़ा, कल छोटी-मोटी बात हुई तो डाउन हो जाए। फिर कहेंगे हम तो जाते हैं अपने लौकिक में, ऐसा कहना भी सिद्ध करता है अलौकिक के बने ही नहीं। मरजीवा बने ही नहीं। उनका नशा जैसे कि बालू की ढेर पर है, ज़रूर वह खिसकेगा। इसलिए उसे सीमेंट की दीवार दे दो तो उतरे नहीं।

आज मैंने बहुत अच्छा भाषण किया, तीर लग गया। मुझे नशा चढ़ गया। अगर मैं दो-चार दिन सेवा नहीं करता तो मेरी खुशी गायब हो जाती। आपस में दो-चार दोस्त मिले तो खुश, अगर नहीं मिले तो खुशी गुम। यह सब कौन-सी स्थितियां हैं? अज्ञानी तो करते लेकिन ब्राह्मणों में भी ऐसी बहुत माया है। वह कहेेंगे मेरी ब्राह्मणी अच्छा क्लास कराती, तुम मेरे क्लास में आना। वह कहेंगे क्यों गये? फिर चला परचिंतन का चक्र। यह भी उल्टा चक्र है। सेवा करने जायेंगे भावना होगी दूसरे के कल्याण की। अन्दर में चलेगी पार्टीबाजी। पार्टी का करेंगे अकल्याण। बाहरी रूप बहुत अच्छा होता, अन्दर में चलेगी मीठी-मीठी छुरी, कभी आँख से तो कभी मुख से। सबसे अच्छा गुण है, सदा बाबा की एक लगन में रहकर इंडिपेंडेंट रहो परन्तु इसका यह भाव नहीं कि मैं तो अपना सबकुछ करूंगा, नहीं। आत्माओं पर डिपेंड नहीं करो लेकिन बाबा पर डिपेंड करो। रहना तुम्हें संगठन में है, ऐसे भी नहीं मेरा तो किसी से कनेक्शन नहीं। निर्माण बनो। निर्माणता के लिए हमें यह दो हाथ मिले हैं। निर्माण बनकर हमें संगठन में चलना है। यह पक्का-पक्का वायदा करके जाओ।

अन्दर में जो कभी-कभी हलचल होती शादी करें! यह थोड़ी भी हलचल मार डालेगी। अब हलचल को समाप्त करो। मुर्दे के अन्दर हलचल होती है क्या? हम पुरानी दुनिया से मुर्दे हो गये। कहते हैं संस्कार परिवर्तन नहीं होते। मैं कहती हो गये तब तो आये हो। माया ने छोड़ा तब तो बाबा के पास पहुंचे। बाबा की गोद मिली है। इसलिए कोई ऐसे संस्कारों की हलचल उठाओ ही नहीं। नींद नहीं आती तो बाबा को याद करो। मुरली पढ़ो, यह तो अच्छी बात है, जागती ज्योति बनो। माया से चिढ़ते क्यों हो! चिढ़ते हो तो चिढ़ाती है।

एक ऋषि की कहानी उसने कहा स्त्री का मुँह नहीं देखूंगा। एक अप्सरा ने कहा मैं बताती हूँ… उसने झोपड़ी के पास जाकर ज़ोर से चिल्लाया, ऋषि आवाज़ सुनकर बाहर आया उसे तरस पड़ा, उसने उठाया, देखते ही उसकी वृत्ति खराब हो गई। उसने थप्पड़ मारा बोला, तुम तो कहते थे कि हम स्त्री का मुँह नहीं देखेंगे फिर यह क्या करते हो। देखा तो मरा। तो हम भी मुर्दों को क्यों देखें! अगर आप एक आँख से देखेंगे तो वह चार आँख से देखेंगे। तंग होंगे तो वह तंग करेंगे।

सच्ची दरबार में आये हो- जो भी कीचड़ा हो दे दान… देहधारी को हाथ लगाना, माना बिच्छू को हाथ लगाना। हमारी चंचलता बाबा ने समाप्त कर दी। बाबा ने हमें अचल बनाया। हम बाबा के अंगद बच्चे हैं। आपस में भी हाथ न लगाओ, बहुत खबरदार रहना है। अगर किसी को टच करते तो बाबा टच नहीं कर सकता। इसलिए डोन्ट टच।

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