संगमयुग, जिसे स्वयं भगवान ने ‘कल्याणकारी युग’ की संज्ञा दी है, अब अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच चुका है। बाबा मुरली में बार-बार संकेत दे रहे हैं कि समय बहुत थोड़ा है। इस नाज़ुक घड़ी में एक तीव्र पुरुषार्थी आत्मा के लिए तीन बातें सबसे अनिवार्य हैं: छोटी से छोटी गलती की महसूसता, उसे बदलने का संकल्प और बाबा की स्मृति द्वारा तुरंत ‘फुल स्टॉप’ लगाना।
महसूसता की शक्ति: आत्मा का जागृत स्वरूप – अक्सर हम बड़ी गलतियों(जैसे क्रोध या लोभ) पर तो ध्यान देते हैं, लेकिन सूक्ष्म कमियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। संगमयुग के इस अंतिम समय में, हमारी स्थिति एक साफ दर्पण की तरह होनी चाहिए। जैसे एक दूध से भरे बर्तन में नींबू की एक छोटी-सी बूंद पूरे दूध को फाड़ देती है, वैसे ही सम्पूर्णता की ओर बढ़ती आत्मा के पुरुषार्थ में एक छोटा-सा ‘व्यर्थ संकल्प’ या ‘अभिमान का अंश’ भी बहुत बड़ा विघ्न पैदा कर सकता है। जैसे एक कुशल घड़ीसाज़ घड़ी के सबसे छोटे पुर्जे की धूल को भी पहचान लेता है क्योंकि वह जानता है कि एक छोटा-सा कण भी समय को धीमा कर सकता है। इसी प्रकार, हमें अपने स्वभाव अैार संस्कारों की सूक्ष्म बारीकियों को महसूस करना होगा। जब तक गलती महसूस नहीं होगी, उसके सुधार का द्वार नहीं खुलेगा।
2. परिवर्तन की शक्ति: महसूसता से कर्म तक का सफर – महसूसता केवल पहला कदम है। यदि हमें पता चल जाए कि घर में आग लगी है(गलती महसूस हो जाए), लेकिन हम उसे बुझाने का प्रयास(परिवर्तन) न करें, तो नुकसान निश्चित है। बाबा कहते हैं कि महसूसता के साथ ‘शक्ति’ जोडऩा ही असली पुरुषार्थ है। परिवर्तन का अर्थ है- अपने पुराने संस्कारों को नए दैवीय संस्कारों में तब्दील करना। जैसे एक किसान जब यह देखता है कि खेत में खरपतवार उग आई है, तो वह केवल उसे देखता नहीं रहता, बल्कि उसे जड़ से उखाड़कर वहाँ नए बीज बोता है। इसी तरह, जैसे ही हमें अपनी किसी कमज़ोरी का पता चले, उसे तुरंत शुभ गुणों और शक्तियों से बदल लेना चाहिए।
3. फुल स्टॉप और बाबा के महावाक्यों की स्मृति – यह सबसे महत्त्वपूर्ण चरण है जिसे आपने स्पष्ट किया। अक्सर आत्माएँ गलती महसूस करती हैं और उसे बदलना भी चाहती हैं, लेकिन उस गलती के बारे में ”क्यों, क्या, कैसे” सोचकर बहुत सारा समय व्यर्थ कर देती हैं। बाबा कहते हैं-”बीती सो बीती।” जो हुआ उसे एक सेकंड में ‘फुल स्टॉप’ लगाकर खत्म करना ही बुद्धिमानी है।
व्यर्थ को समाप्त करने का सबसे सरल तरीका है- बाबा के महावाक्यों की स्मृति को सामने लाना। जब मन में अंधकार या भ्रम हो, तो ज्ञान का एक महावाक्य ‘लाइट’ की तरह काम करता है। जैसे कल्पना कीजिए कि आप गाड़ी चला रहे हैं और रास्ता भटक गए। अब समझदारी इसमें नहीं है कि आप वहीं रुककर रोएं या यह सोचें कि गलती कैसे हुई। समझदारी इसमें है कि जैसे ही गलती महसूस हो, तुरंत ‘ब्रेक’ (फुल स्टॉप) लगाएं, ‘जीपीएस'(बाबा के महावाक्य) की मदद लें और सही दिशा में आगे बढ़ जाएं। जैसे ही आप स्मृति स्वरुप बनते हैं कि ”मैं मास्टर सर्वशक्तिवान हूँ”, पुरानी गलती का बोझ स्वत: ही खत्म हो जाता है। संगम युग का एक-एक सेकंड करोड़ों के समान है। अब हमारे पास विस्तार में जाने का समय नहीं है। हमें ‘बिन्दु’ बनकर ‘बिन्दु'(शिव बाबा) को याद करना है। यदि हम अपनी छोटी-छोटी गलतियों को तुरंत महसूस कर, उन्हें बाबा की याद के जादुई मंत्र से बदल लें और ‘फुल स्टॉप’ लगाकर आगे बढ़े, तो हम बहुत जल्द ‘सफलता मूरत’ बन जाएंगे। यही वह समय है जब हमें अपने समय, संकल्प और शक्तियों की बचत कर ‘डबल लाइट’ फरिश्ता बनना है।



