आज के समय में सबसे सरल कार्य है – सलाह देना। हम बड़ी सहजता से कह देते हैं देश ऐसे चलना चाहिए, समाज वैसा होना चाहिए, परिवार को इस प्रकार सम्भालना चाहिए। परंतु प्रश्न यह है कि क्या हम स्वयं अपने घर के चारों लोगों को संतुलन और प्रेम से सम्भाल पा रहे हैं? जिस कार्य को हमने स्वयं किया ही नहीं, उस पर राय देना केवल शब्दों की खपत है। अनुभव से निकली हुई बात में शक्ति होती है, पर बिना अनुभव की सलाह केवल समय और ऊर्जा की बर्बादी बन जाती है।
सच्ची शक्ति ‘रूलिंग पॉवर’ और ‘कन्ट्रोलिंग पॉवर’ में है- अर्थात् स्वयं पर शासन करने की क्षमता। जब तक मन, वाणी और कर्मेन्द्रियों पर हमारा नियंत्रण नहीं होगा, तब तक हम परिवार, कार्यस्थल या समाज को सही दिशा नहीं दे सकते। स्वराज्य का अर्थ है- मैं अपने मुख का राजा हूँ या उसका गुलाम? यदि कोई प्रेम से आग्रह करे और हम केवल उसे प्रसन्न करने के लिए अपनी इच्छा शक्ति तोड़ दें, तो यह स्वराज्य नहीं, दासता है।
हम अक्सर यह सोचकर जीते हैं कि कहीं किसी को बुरा न लग जाए। दूसरों को खुश रखने की चिंता में हम अपनी मन की शांति खो देते हैं, अपनी आत्मिक शक्ति क्षीण कर देते हैं। पर यदि सचमुच दूसरों को प्रसन्न करने के लिए स्वयं को तोड़ देना ही सम्बन्धों को मजबूत बनाता, तो आज रिश्ते इतने कमज़ोर क्यों होते? छोटी-छोटी बातों पर लोग नाराज़ हो जाते हैं, संवाद बंद कर देते हैं, पुरानी बातें पकड़कर बैठ जाते हैं। यहाँ तक कि स्कूल के बच्चे भी अवसाद की बात कर रहे हैं। क्या यह सशक्त परिवारों की पहचान है?
वास्तव में हम जो कुछ करते हैं, वह केवल दूसरों के लिए नहीं, बल्कि अपने ”टेस्ट” के कारण करते हैं- चाहे वह स्वाद का आकर्षण हो या किसी की कमज़ोरी सुनने का। हम कहते हैं, ”उनकी वजह से किया,” पर निर्णय हमारा अपना था। जीवन हमें तीन विकल्प देता है- राजा बनना, प्रजा बनना या गुलाम बनना। राजा वह है जो अपनी इंद्रियों और मन पर शासन करता है।
छोटी-छोटी आदतों से स्वराज्य की शुरुआत होती है। यदि हम भोजन में संयम रखते हैं तो वह केवल खाने पर नियंत्रण नहीं, बल्कि मन पर विजय का अभ्यास है। यदि हम किसी की बुराई सुनने से इनकार कर दें और स्पष्ट कहें- ”मैंने प्रतिज्ञा की है कि मैं किसी की कमज़ोरी नहीं सुनूँगा”- तो यह आत्मबल की घोषणा है। हमारे शब्द किसी का भाग्य बना भी सकते हैं और बिगाड़ भी सकते हैं। इसलिए वाणी आशीर्वाद बने, आलोचना नहीं।
मौन इस साधना का प्रभावी माध्यम है। प्रतिदिन एक निश्चित समय विशेषकर प्रात:काल मौन का अभ्यास करें। मौन से मुख पर नियंत्रण आता है और मुख पर नियंत्रण से मन पर। बिना नियंत्रण की गाड़ी दुर्घटना की ओर जाती है; उसी प्रकार अनियंत्रित वाणी और मन जीवन को अशांत कर देते हैं। यदि आवश्यक हो तो संकेत या लिखित माध्यम से कार्य करें, पर मुख को अनुशासित रखें। यही छोटी-छोटी साधनाएं इच्छाशक्ति को प्रबल बनाती हैं।
अंतत: जीवन का लक्ष्य दूसरों को गलत तरीके से प्रसन्न करना नहीं, बल्कि स्वयं को सशक्त और पवित्र बनाना है। जो व्यक्ति जीते जी बेदाग रहता है, वही अंत समय भी हल्का और शांत हो जाता है। आज से संकल्प करें – हम अपने कर्मेन्द्रियों के राजा हैं। यही सच्चा स्वराज्य है, यही आत्मिक शक्ति का आधार है, और यही सफल, संतुलित और शांत जीवन का मार्ग है।



