मुख पृष्ठब्र.कु. शिवानीअपने विचारों को कहें… ज़रा रुकिए

अपने विचारों को कहें… ज़रा रुकिए

जैसे ही सुबह उठते हैं नींद खुली, दिमाग में पहले-पहले क्या विचार चलने लगते हैं? जल्दी करो देर ना हो जाए, पानी भरना है। फिर बच्चों को लेट हो जाएगा, उठाना है, तैयार करना है। ये सब विचार हम पैदा कर रहे हैं। अब ज़रा रुकिए। क्षण भर के लिए विचारों को देखिए और इस तरह फ्रेम कर दीजिए कि पानी क्यों चला जाएगा, उठकर जल्दी से भर लेते हैं, सोचने में क्यों टाइम वेस्ट करना।

सुबह जब हम सोकर उठते हैं तो शरीर बाद में उठता है मन पहले उठ जाता है। बल्कि कई बार तो वो रात को सोता भी नहीं है। वो रात को भी गतिशील रहता है, जिसे हम सपने कहते हैं। जैसे ही सुबह उठते हैं नींद खुली, दिमाग में पहले-पहले क्या विचार चलने लगते हैं? जल्दी करो देर ना हो जाए, पानी भरना है। फिर बच्चों को लेट हो जाएगा, उठाना है, तैयार करना है। ये सब विचार हम पैदा कर रहे हैं। अब ज़रा रुकिए। क्षण भर के लिए विचारों को देखिए और इस तरह फ्रेम कर दीजिए कि पानी क्यों चला जाएगा, उठकर जल्दी से भर लेते हैं, सोचने में क्यों टाइम वेस्ट करना।
हमें हर पल अपने विचारों के प्रति सजग रहना होगा। जैसे कभी-कभी हम औरों से पूछते हैं कि क्या हाल-चाल है? ऐसे ही अपने मन के हाल-चाल लेने हैं, वो भी हर पल। आप अभी अपने ख्यालों पर गौर करिए। किसी के अंदर चल रहा होगा कि कौन आ रहा है, कौन जा रहा है। किसी के अंदर चल रहा होगा कि घर पर बच्चे आ गए होंगे, पति आ गए होंगे, चाय पी होगी या नहीं पी होगी। कोई सोच रहा होगा कि जाने के बाद ये खाना बनाना है, कल ऑफिस में ये होना है, वो होना है।

कई बार तो हम मन के विचारों की तरफ ध्यान नहीं देते और वो बहता चला जाता है। जब हमें पता ही नहीं होगा कि मन में क्या चल रहा है तो फिर उसको बदलना तो संभव ही नहीं है।
आइए ये क्रक्या चल रहा हैञ्ज वाला अभ्यास करने की आदत डालते हैं। अब जैसे ही आप मन को देखेंगे, वो तुरंत सावधान की मुद्रा में आ जाएगा। क्योंकि हमें तुरंत एहसास हो जाता है कि मैं ये क्या सोच रहा हूँ। सिर्फ देखने से ही परिवर्तन हो जाता है। मन को कोई खास प्रयास भी नहीं करना पड़ा। आपने सिर्फ गौर किया और थॉट चेंज। पूरे दिन में इस छोटे से अभ्यास को हर आधे घंटे के बाद या हर पंद्रह मिनट में दोहराने में कितना वक्त जाएगा? एक सेकंड।
कल्पना करिए, सुबह नास्ते पर पति या पत्नी से किसी बात पर छोटी-सी बहस हो गई। आपकी पत्नी या पति तो काम पर चले गए, जाने के बाद वह बहस भूल गए। लेकिन हमारे मन में इससे जुड़े ख्याल लगातार चलते रहे। अब इसको कैसे बदलेंगे? अगर इन्हें रोका नहीं गया, तो ये चलते जाएंगे। क्रऐसा नहीं बोलना चाहिए था, ये कोई बात करने का तरीका है, यहां तो कद्र ही नहीं है…। सारा दिन बीत जाएगा, शाम को पति/पत्नी घर आएंगे, उनको कुछ याद नहीं सुबह क्या हुआ था। लेकिन हम मुंह फुलाकर बैठ जाएंगे, क्यों? क्योंकि हम सुबह से अपने मन की गति को धीमा नहीं कर पाए। अब मन को रोकने में कितना टाइम लगता, एक सेकंड। लेकिन वो रुकेगा तब, जब हम रुककर

देखेंगे कि ये गड़बड़ वाला विचार है। नहीं तो हमें लगा ये तो सही ही है। ये हर रोज़ हर सीन में हो रहा है। और फिर हम कहते हैं हम मेहनत इतनी कर रहे हैं अपने रिश्तों में फिर भी हमारे रिश्ते अच्छे नहीं चल रहे हैं। उन्होंने जो कहा वो एक बार कहा कि क्या बनाया है, अच्छा नहीं बनाया है, क्या है तुम्हें कुछ खाना नहीं बनाना आता, हमारी माँ से सीखो कितना अच्छा खाना या नाश्ता बनाती हैं।
आपसे किसी ने एक बार कोई बात बोली, लेकिन आपने उसे अपने मन में हज़ारों बार दोहरा लिया। जब भी ये दिखे कि मन बहुत तेज़ गति पर जा रहा है, तो हमें रुककर बीच में ब्रेक लगाना है। नहीं तो ये ओवर स्पीड हो जाएगा और कहीं न कहीं टक्कर होनी ही है। अब चलते-चलते बीच में सास ने कुछ कह दिया। बात बहुत बड़ी नहीं थी। अगर मन अच्छा नहीं हुआ तो वह छोटी-सी बात बहुत तकलीफ देगी।
अब हमें रुककर चेक करना है कि क्या हम अपने मन पर ब्रेक लगा सकते हैं। यदि संभव है तो फिर हम ब्रेक लगाते क्यों नहीं हैं? क्योंकि हम चाहते ही नहीं हैं। हम मानते हैं कि सामने वाले की गलती ही इतनी बड़ी थी, ऐसे में उनके बारे में गलत सोचना तो ठीक है ना। हम अपने सोचने के तरीके को सही ठहराते हैं। फिर सोचते जाओ, सोचते जाओ। जैसे ही आपने एक क्षण में अपने मन को कहा कि मैं जो सोच रहा हूँ, इससे मेरा ही नुकसान होने वाला है। तो फुलस्टॉप, ब्रेक। लेकिन जैसे-जैसे दूसरे की गलती में रस आने लगेगा, विचारों की यह गति बढ़ती जाएगी। इसे थामिए।

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