संभावना का एकमात्र अवशेष ‘विचार’

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चाहे शब्द हों, चाहे वाणी हो, चाहे कर्म हों, तीनों की पूर्णता विचारों से ही है। कई सारे शब्द जब मिलते हैं तो एक वाक्य की रचना हो जाती है और उस वाक्य के अंदर बहुत सारे अर्थ, भावार्थ सहित छुपे होते हैं। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि एक मनोवैज्ञानिक मैक्स प्लैंक, उनको भौतिक विज्ञानी भी कहते हैं और मनोविज्ञानी भी उन्हें कह सकते हैं, उन्होंने जब क्वांटम फिजि़क्स में ये पाया कि कोई भी जो तरंग है वो ऊर्जा कणों के साथ चलती है। मतलब पहले कोई प्रकाश सिर्फ एक वेव के रूप में चलता था, बाद में उसके अंदर छोटे-छोटे कण भी और इज़ाद कर लिये। इसको नाम दिया इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन। कहने का मतलब है कि हम सभी बहुत छोटे-छोटे शब्दों से, बहुत छोटी-छोटी बातों से, बहुत छोटे-छोटे संकल्पों से, ऐसे संसार, ऐसा शरीर, ऐसे मानव की रचना करते हैं जो हमें पता भी नहीं है लेकिन वो हो रही है। क्योंकि उनका वो प्रयोग था और हम सभी उसको अपने प्रायोगिक जीवन में प्रयोग कर रहे हैं।
आप इसको एक साधारण अनुभव के साथ अगर जोड़ें तो इस तरह से कह सकते हैं कि हम सभी जो कुछ भी कर रहे हैं, जहाँ भी इस समय हमारी बुद्धि है, हम समझो वहीं का संग कर रहे हैं, वैसा ही सोच रहे हैं, वैसा ही बोल रहे हैं। जैसे अगर इस समय हमारी बुद्धि विदेश में है, किसी देश में है, तो इस समय हम वहां का संग कर रहे हैं। अगर इस समय मेरी बुद्धि किसी ऋषि-मुनि को याद कर रही है तो इस समय हमारी बुद्धि उन ऋषि-मुनि की बातों को अपने अंदर लेकर चल रही है। ऐसे अगर हमारी बुद्धि परमात्मा के बारे में सोच रही है तो परमात्मा की बातों के साथ हमारा संग हो रहा है, हमारा योग हो रहा है, हमारा जुड़ाव हो रहा है। उससे हमारे एक-एक सेल, एक-एक टिशू, एक-एक ऑर्गन की रचना हो रही है। इतना गहरा संसार है हम सभी का।
हम सभी कहते हैं पता नहीं, ये वाले विचार कहां से हमारे अंदर पनप गये? क्यों मुझे ये बीमारी आ गई? क्यों मेरे घर में ये समस्या आ गई? तो आपको बताते हुए बिल्कुल हैरानी हमें नहीं हो रही है, क्योंकि जब एक वैज्ञानिक शोध करता है तो शोध में कितना समय लगा देता है! कितनी एकाग्रता के साथ वो चीज़ें करता होगा! लेकिन आज हम बिल्कुल भी किसी चीज़ में एकाग्र नहीं हैं। ध्यान से न हम सोच पा रहे हैं, न ध्यान से खा पा रहे हैं, न खुद के ऊपर ध्यान दे पा रहे हैं। चल रहे हैं तो बेपरवाह, खा रहे हैं तो बेपरवाह तरीके से खा रहे हैं, बोल रहे हैं तो बेबाक बोल रहे हैं। इन सारी चीज़ों में क्या हमारी ऊर्जा नष्ट नहीं हो रही है? कहते हैं कि सुनना भी एक ऊर्जा है, देखना भी ऊर्जा है, प्रकाश की ऊर्जा, ध्वनि ऊर्जा, हर चीज़ तो ऊर्जा है ना! और इस ऊर्जा को ऊर्जा दे कौन रहा है? आत्मा ही तो दे रही है। सोल दे रही है ऊर्जा इन सारी चीज़ों को। और उसके अंदर जहाँ-जहाँ उसकी बुद्धि है, जो-जो वो देख रहा है, सुन रहा है, सोच रहा है, वो उसी हिसाब से ऊर्जा को उत्पन्न कर रहा है। और उस ऊर्जा से हमारा पूरा शरीर बनता है। आप सोच लीजिए, इस समय हमारी ऊर्जा कहां-कहां जुड़ी हुई है? किसी भी देह से जुड़ी है, देह के सम्बंधी से जुड़ी है, जाति, धर्म, वर्ग, पद से जुड़ी है, और जैसी चीज़ों के साथ हमारी ऊर्जा जुड़ी है, वैसा ही हमारे शरीर का निर्माण है, हमारे आस-पास का वातावरण है। तो इसका मतलब हम सभी आह्वान करके ऐसे समाज और ऐसे संसार को रच रहे हैं। तो सम्भावना अगर है कहीं पर तो वो हमारे विचारों में है। और हमारे उन विचारों की वजह से ही जो थोड़ा-बहुत विचार संकल्पों में शेष बचा है, वही हमारे लिए विशेष बचा है।
तो उस विशेष विचार को हम अगर और विशेष बनाना चाहते हैं, एक होता है बेहतर और दूसरा होता है बेहतरीन। तो बेहतर तो हम सोचते हैं, लेकिन अब हमको बेहतरीन सोचना है। बेहतरीन क्या हो सकता है? छोटे-छोटे अच्छे संकल्प। अच्छी-अच्छी बातें अगर हम सोचें कि मैं बहुत अच्छा हूँ, मैं स्वस्थ हूँ, मेरा घर स्वस्थ है, मेरा देश बहुत अच्छा है, मेरे देश के लोग बहुत अच्छे हैं, हर एक घर में खुशहाली है, हर एक घर में धीरे-धीरे ऐसी चीज़ें आएं जिससे समाज का हर एक वर्ग सुखी हो, शांत हो। तो क्या हम एक नई ऊर्जा को पैदा नहीं करेंगे! तो इस ऊर्जा को और ज्य़ादा बेहतर बनाने के लिए रोज़ हम इन विचारों के साथ जुडक़र अगर जीना शुरु कर दें, सिर्फ यही सोचना शुरु कर दें तो छोटे-छोटे कणों के रूप में ये ऊर्जा हमारे अंदर भरती चली जाएगी और हमारे पूरे शरीर का निर्माण दूसरे तरीके से हो जाएगा जैसा हम चाहते हैं। तो इन संभावनाओं को जागृत करने के लिए जो थोड़े-बहुत अच्छे विचार अवशेष के रूप में बचे हैं उनकी रचना करिये, उनको क्रियेट करिये और नये समाज और संसार का निर्माण करिये।

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