मुख पृष्ठब्र. कु. सूर्यमन की बातें राजयोगी - ब्र.कु. सूरज भाई

मन की बातें राजयोगी – ब्र.कु. सूरज भाई

प्रश्न : मैं जयपुर से हर्षवर्धन राठौड़ हूँ। योग के प्रयोग अनेक लोग जहाँ-तहाँ कर रहे हैं। इसके लिए रूचि सभी की और बढ़ जाये, इसके लिए कोई सुन्दर अनुभव बताइये।
उत्तर :
एक अनुभव तो बीमारियों का आया। एक माता मुझे मिली और कहा मेरे को इतना पेन था बॉडी में और इतनी समस्यायें रहती थी और मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ और दवाई खा-खा के भी थक गई थी। लेकिन मैं पूरी ठीक हुई केवल चार्ज वॉटर पीने से। उसने उसमें विश्वास रखा। और उससे वो बिल्कुल ठीक हो गई। तो ये एक बहुत अच्छा अनुभव था। उनके चेहरे पर बहुत रौनक आ गई थी। एक और अनुभव जो शायद मैंने पहले भी सुनाया होगा – एक सात साल की लडक़ी को आठ एमएम का हार्ट में छेद हो गया। और उनकी माँ ने उनको एनर्जी दी राइट हैंड से। कुछ ही दिनों में वो भर गया और उसके परिवार वाले बहुत खुश हुए। तो योग तो संसार की सर्वोच्च शक्ति है। जहाँ मेडिकल साइंस कुछ नहीं कर पाती वहाँ स्पिरिचुअल साइंस बहुत अच्छा काम कर लेती है। इसलिए ज़रूरत इस चीज़ की है कि अपने अन्दर योग का बल बढ़ाते चलें। क्योंकि जितना हम योग शक्ति को बढ़ाते जायेंगे उतना ही समस्याओं पर इस शक्ति की विजय होगी। और कोई का मन ऐसे ही भटकता रहे उसे योग लगाना ही न आता हो, वो सिर्फ दिखावे से योग कर ले और फिर शिकायत करे हमारी तो समस्या हल नहीं हुई तो समस्या ऐसे हल नहीं होगी।
मुम्बई से भी एक माता का फोन कॉल आया कि वो बता रही थी कि उनके परिवार में, उनके जीवन में फाइनेंशियल क्राइसिस(संकट) आ गया है जैसे। जिसने बहुत सारे पैसे देने थे वो दे नहीं रहा और वे उधार में फंस गये हैं। उनसे लेने वाले भी बहुत आ रहे हैं। तो मैंने उनको कुछ प्रयोग सिखाये थे। तो फिर उसके बाद उन्होंने बताया कि पहला फायदा तो ये हुआ कि मेरा चित्त शांत हो गया जो बहुत परेशान था। तो मैंने कहा कि अगर आपका चित्त शांत हो गया तो समस्यायें जल्दी समाप्त हो जायेंगी। क्योंकि मनुष्य के अन्दर ही बहुत शक्तियां हैं। और वे व्यर्थ संकल्पों में नष्ट होती रहती हैं। अगर हम व्यर्थ से स्वयं को मुक्त कर दें तो हमारी वो शक्तियां समस्याओं को मुक्त करने में लग जाती हैं। और मैंने उनको कुछ विधि सजेस्ट की और कहा कि एकाग्रता से करो। तो उन्होंने कहा कि पंद्रह दिन तो एकाग्रता से हुआ लेकिन उसके बाद ज्य़ादा अच्छा नहीं हुआ, वो समस्याओं के थॉट्स मुझे बार-बार आते रहे। तो ये सच है कि अगर बहुत अच्छी एकाग्रता से मनुष्य प्रयोग करे तो संसार की ऐसी कोई समस्या नहीं जो योगबल से हल न हो पाये।

प्रश्न : मेरा नाम सरल शर्मा है। मैं इंजीनियरिंग का फॉर्थ ईयर का स्टूडेंट हूँ और मैं स्टडी बहुत करता हूँ। लेकिन मैं जब भी बैठता हूँ स्टडी करने के लिए तो मन में बहुत सारे निगेटिव विचार आते हैं और मेरी एकाग्रता भंग हो जाती है। मैं क्या करूँ?
उत्तर : मैं ज़रा ऑपनली बता देता हूँ, अगर मनुष्य का प्यार कहीं देहधारियों में अटक गया तो फिर उनकी पढ़ाई से एकाग्रता नष्ट हो जाती है। क्योंकि इसके पीछे उनकी काम वासना काम करती रहती है। वो अतृप्त रहती है। वो उनको परेशान करती रहती है। अब वो शादी भी तो नहीं कर सकते एकदम से। तो एक तो इससे विद्यार्थियों को बहुत बचना चाहिए। दूसरी चीज़ है नेट। नेट पर कुछ ऐसी-वैसी साइट पर जाना प्रारम्भ कर दिया, गंदी-गंदी पिक्चर्स देखने लगे तो उससे भी मन बहुत ज्य़ादा भटक जाता है। इससे भी बहुत बचना चाहिए। लेकिन आजकल कुछ ऐसे भी केसेज आ रहे हैं लडक़े-लड़कियों के। उनकी बुद्धि कहीं नहीं है फिर भी मन नहीं लग रहा है। ये एक समय का इफेक्ट हो गया है। मैं इसमें एक चीज़ अपने सभी दर्शकों को कह देना चाहूंगा कि ब्रेन की शक्ति दिनोंदिन कमज़ोर हो रही है। पढ़ाई का प्रेशर बढ़ रहा है। तो ब्रेन कहीं न कहीं उसको सहन नहीं कर पाता और यहाँ हो जाता है असंतुलन। इससे ब्रेन की मेमोरी वीक होने लगती है। दूसरा हमारे चारों ओर बैड एनर्जी ज्य़ादा है, वो हर मनुष्य के ब्रेन को इफेक्ट करती है। उसके कारण भी एकाग्रता नष्ट होती है और मेमोरी पॉवर वीक पडऩे लगती है। जो मैंने कहा कि इन चीज़ों से विद्यार्थियों को बचना चाहिए।
अब मैं एक विधि बताता हूँ जो बहुत इम्र्पोटेंट है। जिसके द्वारा हर विद्यार्थी को सफलता मिली है। मैंने तो उनको भी सिखाया जिन्होंने ज्ञान-योग के पथ पर अभी कदम नहीं रखे थे। उनको सिखाया कि तुम आत्मा हो, तुम यहाँ निवास करती हो। भृकुटि के बीच अपने को यहाँ देखो और संकल्प करो कि मैं स्वराज्य अधिकारी हूँ। मैं अपना राजा हूँ। अपनी मन-बुद्धि का राजा हूँ, उनका मालिक हूँ और फिर अपने मन को आदेश दो हे मेरे मन तू बहुत भटक लिया, अब भटकना छोड़ दे। हे मेरी बुद्धि बहुत विचलित रही है अब तुम स्थिर हो जाओ। और जो मैं पढूं वो सब याद कर ले। तो ये संकल्प बहुत ही सुन्दर हैं। क्योंकि हम बुद्धि के मालिक हैं तो बुद्धि इस कमांड को स्वीकार कर लेती है। और ग्रहण शक्ति उसमें सबकुछ है, मेमोरी पॉवर उसमें ही है। सबकुछ उसे याद रहने लगता है।
मुझे विद्यार्थी बहुत अच्छे अनुभव सुनाते हैं हमने ये अभ्यास किया, हमारा चित्त भी शांत हुआ और पढ़ाई में भी मन लगने लगा और याद भी ज्य़ादा रहने लगा। दिन में पाँच बार ये प्रैक्टिस कर लें- मैं आत्मा स्वराज्यधिकारी, मन-बुद्धि की मालिक, मन को आदेश दें- शांत हो जाओ। बुद्धि को आदेश दो कि तुम अब स्थिर हो जाओ और अभी जो मैं पढूंगा वो याद कर लेना। तो ये छोटी-सी प्रैक्टिस है इससे वो समस्या हल हो जायेगी। मुझे तो स्टूडेंट्स ही बताते हैं कि हमारा तो मन हल्का हो गया, मन एकदम संतुष्ट हो गया, शांत हो गया और पढ़ाई को एन्जॉय करने लगे।

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