मैजॉरिटी का पुरुषार्थ क्यों कम या ढीला होता है, उसके तीन मुख्य कारण बापदादा ने देखे हैं। पहला कारण मनमत- अगर एक बारी भी आपने किसी की कूड़े कचरे की बात सुन ली तो दूसरी बार वह कहाँ जायेगा? आप उसके लिए कूड़े-कचरे का डिब्बा बन गए हैं ना। जब कभी ऐसा-वैसा समाचार होगा तब वह आपके पास ही आयेगा, अपना सारा कूड़ा-कचरा सुनाने के लिए क्योंकि आपने एक बार सुना है ना। अब उसे समझाओ कि, ऐसी-वैसी बातें हमें न सुनाए या उसको ऐसी बातों से मुक्त करो। सुन करके इंटरेस्ट नहीं बढ़ाओ। अगर आप में इतनी ताकत हो जो सेकण्ड में बातों पर फुलस्टॉप लगा सको, उसके प्रति दृष्टि में व संकल्प में भी घृणा भाव बिल्कुल नहीं आए, इतनी पॉवर आप में है तब ही सुनना। दूसरा कारण, श्रीमत में परचिंतन- परचिंतन वालों का स्वचिंतन कभी नहीं चलेगा। कोई भी बात होगी परचिंतन वाला अपनी गलती दूसरों पर लगाएगा। बात बनाने में नम्बर वन होते हैं। स्वचिंतन इसको नहीं कहा जाता है कि सिर्फ ज्ञान की पॉइंट्स सुन ली, सुना ली, रिपीट कर दी। स्वचिंतन अर्थात् अपनी सूक्ष्म कमज़ोरियों को, छोटी-छोटी गलतियों को चिन्तन करके मिटाना, परिवर्तन करना, यह है स्वचिंतन। तीसरा कारण परदर्शन- दूसरे को देखने में मैजॉरिटी होशियार हैं। जो दूसरे को देखने में समय लगाएगा उसको खुद को देखने का समय कहाँ से मिलेगा! वह बात अलग है कि जि़म्मेवारी के कारण सुनना-देखना भी पड़ता है, उसमें भी कल्याण की भावना से सुनना और देखना लेकिन अपनी अवस्था को हलचल में लाकर देखना, सुनना या सोचना यह बिल्कुल रॉन्ग है। अगर आप अपने को जि़म्मेवार समझते हो तो जि़म्मेवारी के पहले अपनी स्थिति रूपी ब्रेक पॉवरफुल बनाओ। जि़म्मेवारी भी एक ऊंची स्थिति है। जि़म्मेवारी भल उठाओ लेकिन पहले यह चेक करो कि सेकण्ड में बिंदी लगती है? तीन ‘प’ की बातों से मुक्त बनो और एक ‘प’ की बात धारण कर लो। तीनों प्रकार के ‘प’ परमत, परचिंतन, परदर्शन को खत्म करो और एक ‘प’ पर उपकारी बनो, सर्व उपकारी बनो।




