Homeदादी जीदादी प्रकाशमणि जीहमारे दो पंख हैं -उमंग और उल्हास

हमारे दो पंख हैं -उमंग और उल्हास

कई कहते हैं हमें योग का अथवा बाबा से सर्व संबंधों का अनुभव नहीं होता या मैं बाबा की शक्ति का स्वयं में अनुभव नहीं करती – मैं कमज़ोर हूँ तो इन सबका कारण है कि बाबा से सच्चे दिल की लगन नहीं है। बाबा से लाइन क्लीयर नहीं है अथवा बाबा जो है जैसा है मैंने पहचाना तो मेरे में इतनी लगन व शक्ति भी होगी। तो पहले अपना कनेक्शन देखना है कि मेरे में कोई देह अभिमान तो नहीं है? मेरे में किसी के संगदोष का असर तो नहीं होता है? मेरे में किसी भी बात के कारण कभी संशय उत्पन्न तो नहीं होता? ऐसे अनेक बातों से खुद को चेक करना है।
हमारा फाइनल पेपर है स्मृतिलब्धा नष्टोमोहा लेकिन इस पेपर में वही पास होता है जो सच्ची, साफ दिल वाला है। जिसकी नज़रों में सदा एक परमात्मा बाप ही दिखाई पड़ता है। कई बार यह जो आता कि यह मेरे सम्बन्धी, मेरी प्रॉपर्टी, मेरी योग्यता यह मैं-मेरा भी बहुत नुकसान करता है। जहाँ मैं है वहाँ निर्मानता आ नहीं सकती। वह नव-निर्माण का कार्य कर नहीं सकते। और जिनमें निर्मानता नहीं वे न तो दिलपसन्द रहते, न लोकपसन्द बन सकते और न ही उन्हें प्रभु पसन्द का सर्टिफिकेट मिलता। सच्चाई वाला प्रभु पसन्द है उसे प्रभु की दुआएं एक की दस गुणा मिलती हैं। प्रभु से एक प्यार करे तो प्रभु 100गुणा प्यार देता है। यह अनुभव प्रैक्टिकल होना चाहिए। बाकी कहाँ तक हर एक करता वह अपनी स्थिति को देखे कि मुझे उस पिता परमात्मा से एक का 10 गुणा, 100गुणा रिटर्न मिलता है? संकल्प करूं एक, रिटर्न मिले बाबा की मदद के अनेक। बाबा वक्त पर पेपर भी लेता लेकिन उनको यह अनुभव होगा कितने भी विघ्न क्यों न आएं। स्थितियों के आएं, बीमारियों के आएं, लौकिक आएं, अलौकिक आएं या सेवाओं के, संस्कारों के आएं। परंतु जहाँ बाबा बैठा है वहाँ बाबा की अनेक प्रकार से मदद मिलती है। बाबा के यह महावाक्य कि बच्चे सच्ची दिल पर साहेब राज़ी, यह हमें हर कदम पर अनुभव हो। अनुभव होता है तो कनेक्शन ठीक है।
अनुभव नहीं होता तो ज़रूर कहाँ मेरी बुद्धि के अन्दर कांटा है। जब बुद्धि क्लियर नहीं होगी तो कहाँ इधर-उधर जरूर भटकेगी। तो चेक करना है मेरी बुद्धि कहाँ भटकती तो नहीं है?
ऐसे जो स्मृति स्वरूप हैं वही नष्टोमोहा बनते हैं। उसी का नाम है सच्चे ट्रस्टी। तो चेक करो कि हम सब पक्के ट्रस्टी हैं? जो स्मृतिलब्धा होगा वह वैभवों के आधार पर स्थिति को नहीं खड़ा करेगा, वैभवों के आधार पर सेवा करूं, वैभवों के आधार पर मैं अपनी जीवन को निभाऊं, वैभवों के आधार पर मैं त्यागी रहूँ, तो वह त्यागी नहीं। वैभवों के आधार पर न स्थिति रखो, न सेवा रखो क्योंकि हम बेगर टू प्रिन्स हैं। बाबा ने हमें एकदम नया जन्म दिया, नया जन्म माना कि हमारा कुछ भी नहीं। यह स्मृति और फिर नष्टोमोहा की भी बहुत सूक्ष्म मंजि़ल है। कई बार हम दूसरों को तो ज्ञान देते कि हमें टेन्शन मुक्त रहना है लेकिन खुद टेन्शन वाले गृहस्थी बन जाते। कोई प्रॉब्लम है, कोई सेवा है, कोई कार्य है आप बाबा की मदद से उसे हल करो। लेकिन चिन्तित हो करके, डर करके उसका हल करने से हल नहीं होगा। तो सच्ची दिल वाले बाबा के बच्चों की किसी भी व्यक्ति में, वस्तु व वैभव में, लौकिक व अलौकिक में, सेवाओं में… किसी में भी अटैचमेंट नहीं होगी। इन सबसे मुक्त होने का साधन है कि आप उड़ता पंछी बनकर रहो। सदा उड़ती कला को अपने सामने रखो। लेकिन उड़ती कला के लिए पंख चाहिए। पंछी उड़ता तभी है जब उसके दो पंख है। तो हमारे भी दो पंख हैं — उमंग और उल्हास। उमंग उल्हास होगा तो इतना दिल, रूचि से बाबा की याद में उड़ते रहेंगे।

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