परमात्म उर्जा

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रूहानी ड्रिल जानते हो? जैसे शारीरिक ड्रिल के अभ्यासी एक सेकण्ड में जहाँ और जैसे अपने शरीर को मोडऩे चाहें वहाँ मोड़ सकते हैं, ऐसे रूहानी ड्रिल करने के अभ्यासी एक सेकण्ड में बुद्धि को जहाँ चाहो, जब चाहो उसी स्टेज पर, उसी परसेन्टेज से स्थित कर सकते हो? ऐसे एवररेडी रूहानी मिलिट्री बने हो? अभी-अभी ऑर्डर हो- अपने सम्पूर्ण निराकारी, निरहंकारी, निर्विकारी स्टेज पर स्थित हो जाओ; तो क्या स्थित हो सकते हो? व साकार शरीर, साकारी सृष्टि व विकारी संकल्प न चाहते हुए भी अपने तरफ आकर्षित करेंगे? इस देह की आकर्षण से परे एक सेकण्ड में हो सकते हो? हार और जीत का आधार एक सेकण्ड होता है। तो एक सेकण्ड की बाजी जीत सकते हो? ऐसे विजयी अपने आपको समझते हो? ऐसे सर्व शक्तियों के सम्पत्तिवान अपने को समझते हो व अभी तक सम्पूर्ण सम्पत्तिवान बनना है? दाता के बच्चे सदा सर्व सम्पत्तिवान होते हैं, ऐसे अपने को समझते हो व अभी तक 63 जन्मों के भक्तपन व भिखारीपन के संस्कार कब इमर्ज होते हैं? बाप की मदद चाहिए, आशीर्वाद चाहिए, सहयोग चाहिए, शक्ति चाहिए- चाहिए-चाहिए तो नहीं हैं? चाहिए शब्द दाता, विधाता, वरदाता बच्चों के आगे शोभता है? अभी तो विधाता और वरदाता बनकर विश्व की हर आत्मा को कुछ-न-कुछ दान व वरदान देना है, न कि यह चाहिए, यह चाहिए… का संकल्प अभी तक करना है। दाता के बच्चे सर्व शक्तियों से सम्पन्न होते हैं। यही सम्पन्न स्थिति सम्पूर्ण स्थिति को समीप लाती है। अपने को विश्व के अन्दर सर्व आत्माओं से न्यारे और बाप के प्यारे विशेष आत्माएं समझते हो? तो साधारण आत्माएं और विशेष आत्माओं में अन्तर क्या होता है, इस अन्तर को जानते हो? विशेष आत्माओं की विशेषता यही प्रत्यक्ष रूप में दिखाई देनी चाहिए जो सदा अपने को सर्व शक्तियों से सम्पन्न अनुभव करें। जो गायन है क्रक्रअप्राप्त नहीं कोई वस्तुञ्जञ्ज… वह इस समय जब सर्व शक्तियों से अपने को सम्पन्न करेंगे तब ही भविष्य में भी सदा सर्व गुणों से भी सम्पन्न, सर्व पदार्थों से भी सम्पन्न और सम्पूर्ण स्टेज को पा सकेंगे। जो भी अपने में अप्राप्ति अनुभव करते थे, वह प्राप्ति के रुप में परिवर्तन हुए, कि अभी तक भी कोई अप्राप्ति अनुभव करते हो? यह प्राप्ति अविनाशी रहेगी। प्राप्ति अर्थात् प्राप्ति।
जब अनुभव-स्वरूप बन गये तो अनुभव की बातें अविनाशी होती हैं। सुनी हुई बातें, वायुमण्डल के प्रभाव के आधार पर प्राप्त हुई बातें व कोई श्रेष्ठ आत्माओं के सुनने के आधार पर, उस प्रभाव के अंदर प्राप्त हुई बातें अल्पकाल की हो सकती हैं, लेकिन अपने अनुभव की बातेें सदाकाल की, अविनाशी होती हैं। तो सुनने वाले बने हो व अनुभवीमूर्त बने हो? कि अभी फिर से सुनी हुई बातों को मनन करने के बाद अनुभवी बनेंगे? मिले हुए खज़ाने को अपने अनुभव में लाया है या वहाँ जाकर फिर लायेंगे? सभी से पॉवरफुल स्टेज है अपना अनुभव-क्योंकि अनुभवी आत्मा में विल-पॉवर होती है। अनुभव के विल-पॉवर से माया की कोई भी पॉवर का सामना कर सकेंगे। जिसमें विल-पॉवर होती है वह सहज ही सर्व बातों का, सर्व समस्याओं का सामना भी कर सकते हैं और सर्व आत्माओं को सदा सन्तुष्ट भी कर सकते हैं। तो सामना करने की शक्ति से सर्व को सन्तुष्ट करने की शक्ति अपने अनुभव के विल-पॉवर से सहज प्राप्त हो जाती है। तो दोनों शक्तियों को अपने अन्दर अनुभव कर रहे हो? अगर दोनों शक्तियां आ गई तो विजयी बनेंगे। ऐसे विजयी बने हो? विजयी अर्थात् स्वप्न में भी संकल्प रूप में हार न हो।

जब स्वप्न में हार नहीं होगी तो प्रैक्टिकल जीवन में तो होगी नहीं ना। ऐसे सम्पूर्ण निशानी को एक सेकेण्ड में अपना निशाना बना सक ते हो? जैसे जिस्मानी मिलिट्री वाले एक सेकेण्ड में अगर निशाना नहीं बना सकते तो हार खा लेते, निशाना ठीक होता है तो विजयी बन जाते हैं । ऐसे बुद्धि को इस निशाने पर एक सेकेण्ड में ठीक टिका सकते हो? ऐसे एवररेडीे बने हो कि मेहनत करने बाद निशाने पर स्थित हो सकते हो? ऐसे प्रयत्न करते-करते विजय का सेकेण्ड तो बीत जायेगा, फिर विजय माला के मणके कैसे बन सकेंगे? इसलिए जैसे निरन्तर याद में रहना है वैसे निरन्तर विजयी बनो। ऐसी चेकिंग करो कि आज सारे दिन मेें संकल्प, वचन, कर्म, सम्बन्ध-सम्पर्क, स्नेह, सहयोग और सेवा में विजयी कहाँ तक बने ? अगर बहुत समय से सदा के विजयी, हर कदम के विजयी, हर संकल्प के विजयी रहेंगे तब ही विजय माला में समीप के मणके बन सकेंगे। इतनी सर्विस के बाद भी 108 ही विजयी क्यों बने? कैसे बने? इस पुरुषार्थ से ऐसे श्रेष्ठ बने। तो बहुत समय से सदा के विजयी बनेंगे तभी बहुत समय से यादगार बना सकेंगे। इसलिए अब क्या करेंगे?

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