प्रश्न:- हमने सुना है कि आपको कभी अशुद्ध संकल्प नही आते हैं। अशुद्ध संकल्पों से हम कैसे फ्री हो सकते हैं?
उत्तर:- अशुद्ध संकल्प तब आते हैं जब मार्जिन हो। हमने कभी अशुद्ध देखा ही नहीं है, अशुद्ध का अनुभव ही नहीं है और साथ-साथ बाबा का वरदान भी है, बचपन से हम बाबा के पास आ गए। शुद्ध का अनुभव ज्यादा है इसलिए वह खींचता है। बाकी ऐसे नहीं है कि कोई कमी ही नहीं है। पुरुषार्थ तो रहता ही है। बाकी अशुद्ध तब आता है जब बुद्धि फ्री होती है। जिन्होंने शुरू से लेकर बाबा की पढ़ाई पर, श्रीमत पर पूरा अटेन्शन दिया है, बुद्धि को बिज़ी रखा है उनके पास अशुद्ध संकल्प आ ही नहीं सकते। बिज़ी हैं तो दूसरी चीज़ आने की फुर्सत ही नहीं। बुद्धि को बिज़ी रखो तो माया व व्यर्थ संकल्प-विकल्प आ नहीं सकते। जो बाबा ने सुनाया है उसकी गहराई में जाओ, अंतर्मुखी होकर उस पर मनन करो। इधर-उधर की बातों में इन्टे्रस्ट न हो, संग से सम्भाल करो। अपना टीचर स्वयं बनकर अपने आपको रोज़ होमवर्क दो। तो व्यर्थ व अशुद्ध संकल्प से बचे रहेंगे। बाबा तो हमारा टीचर है ही लेकिन बाबा ने जो पढ़ाया है उसको अपने जीवन में उतारना अर्थात् अपना टीचर आप बनना, अपनी चेकिंग आप करना। जो अपने आपका टीचर बनता है वह सदा बिज़ी होने के कारण दूसरी सब बातों से फ्री हो जाता है।
प्रश्न:- बापदादा जब आपके तन में आते हैं तो बापदादा के आने के पहले का, बापदादा जब तन में होते हैं, उस समय का और जब चले जाते हैं उस समय का आपका अनुभव क्या है?
उत्तर:- जब बापदादा को आना होता है तो प्रोग्राम अनुसार हम यहाँ आकर बैठते हैं, उस समय जैसे हम ट्रांस में जाते हैं, वैसे ही ट्रंास में जाते। उसमें अपनी मेहनत नहीं करनी पड़ती। योग में तो हम अपने पुरुषार्थ से बुद्धि को एकाग्र करते हैं लेकिन ट्रांस में अपनी मेहनत नहीं होती। सिर्फ बुद्धि को निरसंकल्प बनाना पड़ता है। जब तक हमारी बुद्धि में कोई संकल्प होता तब तक गुम नहीं हो सकती। ट्रांस माना गुम हो जाना। इसलिए जब हम यहाँ बैठते हैं, जिस समय बाबा को बुलाना होता है उस समय गुम हो जाती। जब ट्रांस में जाने लगती तो मालूम पड़ता है कि हम गुम हो रही है, गुम होते-होते जिस समय अपनी एकदम विस्मृति हो जाती, उस समय पता नहीं पड़ता। गुम होने के बाद कभी सीधा अपने को सूक्ष्मवतन में देखती हूँ, कभी-कभी रास्ते की फीलिंग आती है। ऐसे लगता है जैसे बादलों से पार होकर जा रहे हैं। यह साकार शरीर तो भूल जाता है लेकिन आकारी शरीर में अपने को देखती हूँ और आकार वतन में बाबा के सामने अपने को देखती हूँ। पहले थोड़ा बहुत मिलन होता है। बाबा को भी पता है- बच्चों से मिलने जाना है। फिर जिस समय बाबा प्रवेश होते हैं उस समय के बाद मुझे अपना पता नहीं होता है, फिर मैं न अपने को सूक्ष्मवतन में देखती हूँ, न परमधाम में। अपने शरीर का कोई कॉन्शियस भी नहीं होता। जितना टाइम बाबा होता है, उतना टाइम हमारी स्टेज जो होती है वह जैसे लोटने के बाद वर्णन कर सकती हूँ। जितना समय उस स्थिति में हूँ उतना टाइम पता नहीं पड़ता। मैं गुल्ज़ार हूँ, या मेरे तन में बाबा काम करा रहा है, इससे बात कर रहा है, इससे मिल रहा है, यह कॉन्शियस नहीं होती। उस समय जैसे स्मृति का स्विच ऑफ है। फिर लास्ट में बाबा जब वतन में जाते हैं तो फिर मिलन होता है, उस समय लगता है कि बीच का टाइम मेरे से मिस हुआ। जिस समय फिर से मिलन होता है उस समय ऐसी फीलिंग आती है जैसे नींद से उठने के बाद नींद का अनुभव होता है। ऐसे लगता है जैसे एकदम स्वीट साइलेन्स की स्टेज से, बहुत मीठी स्टेज से नीचे आई हूँ। यह भी नहीं कोई घूम कर आई हूँ, सैर करके आई हूँ या कोई से बातचीत करके आई हूँ,नहीं। ऐसे लगता जैसे ऊपर से नीचे आई हूँ इसलिए मुझे कुछ थकावट नहीं होती है। जिस समय बाबा शरीर में है। शरीर सेवा करता है, आत्मा भी जरूर अंदर ही होगी, बाहर तो इतना टाइम निकल नहीं सकती। लेकिन जैसे रेडियो टीवी का चैनल होता है। जिस चैनल का स्विच खोलेंगे वही आएगा। ऐसे ही मेरी समझ का चैनल ऑफ हो जाता है, हमको स्मृति नहीं रहती, पता नहीं होता कि बाबा इतनों से मिला। टाइम का भी पता नहीं पड़ता है। लेकिन स्वीट साइलेन्स की स्टेज बहुत प्यारी लगती है इसलिए आप सबसे भी ज्यादा रिफ्रेश हम होते हैं।

