धनतेरस का नाम सुनते ही हमारे मन में क्या आता है? बाज़ार, खरीदारी, सोना-चाँदी, नए बर्तन और घर में आने वाली नई वस्तुएं। हम सोचते हैं कि धनतेरस के दिन कु छ नया खरीदना शुभ होता है। बिल्कुल, खरीदिए। अपनी आवश्यकता और सामथ्र्य के अनुसार जरूर खरीदिए। लेकिन आज मैं आपसे एक छोटी-सी बात पूछना चाहता हूँ – हम हर साल घर के लिए कुछ नया खरीदते हैं, क्या इस धनतेरस अपने लिए भी कुछ नया खरीदेंगे? ज़रा सोचिएगा!
धनतेरस का सुंदर संदेश:
दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव की शुरूआत धनतेरस से होती है। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को यह पर्व मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य अमृत कलश के साथ हुआ था। इसलिए धनतेरस का संबंध केवल धन से नहीं, बल्कि आरोग्य और स्वस्थ जीवन से भी है।
हम धन को अक्सर पैसा, संपति और सोना-चाँदी मान लेते हैं। लेकिन अगर किसी के पास बहुत धन है और स्वास्थ्य नहीं है, मन की शांति नहीं है, परिवार में प्रेम नहीं है, तो क्या वह वास्तव में सुखी और समृद्ध है? इसलिए धनतेरस हमें एक बहुत सुंदर बात सिखाती है- स्वास्थ्य धन है, शांति धन है, संतोष धन है और अच्छे संबंध भी धन हैं।
खरीदारी की परंपरा
इस दिन सोना, चाँदी, आभूषण, नए बर्तन और धातु की वस्तुएं खरीदने की परंपरा है। आज लोग अपनी जरूरत के अनुसार वाहन, इलेक्ट्रॉनिक सामान और घर की उपयोगी वस्तुएं भी खरीदते हैं। नई वस्तु घर में आती है तो हमें खुशी होती है। लेकिन इस बार एक सवाल अपने मन से जरूर पूछें – मेरे जीवन में नया क्या आ रहा है? क्या मैं अपने पुराने क्रोध को छोड़ रहा हूँ? क्या मैं शिक ायत की जगह संतोष ला रहा हूँ? क्या मैं नकारात्मक विचारों की जगह शुभभावना ला रहा हूँ? अगर ऐसा कर रहे हैं, तो समझिए आपने वास्तव में धनतेरस मनाई।
घर की सफाई, मन की सफाई
धनतेरस और दीपावली पर हम घर की सफाई करते हैं। पुराना सामान निकालते हैं, घर को सुंदर बनाते हैं और दीप जलाते हैं। लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से एक और सफाई जरूरी है- मन की सफाई।
हमारे मन में भी कितना कुछ जमा रहता है- पुरानी नाराज़गी, किसी के प्रति शिकायत, ईर्ष्या, क्रोध, चिंता और व्यर्थ विचार। जैसे घर का कचरा निकालते हैं, वैसे ही मन का कचरा भी निकालना होगा। घर साफ होगा तो घर सुंदर लगेगा, मन साफ होगा तो जीवन सुंदर लगेगा।
असली धन कौन-सा है?
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो आत्मा की असली संपत्ति उसके मूल गुण हैं- ज्ञान, पवित्रता, पे्रम, सुख, शांति, आनंद और शक्ति।
सोना-चाँदी बाहर की संपत्ति है, लेकिन शांति और संतोष भीतर की संपत्ति हैं। बाहर का धन परिस्थितियों के साथ बदल सकता है, लेकिन भीतर का धन जीवन की हर परिस्थिति में हमारा साथ देता है। इसलिए धनतेरस पर कुछ क्षण अपने लिए निकालें। शांत होकर बैठें और अनुभव करें – ”मैं आत्मा हूँ…शांत स्वरूप हँू….पवित्र स्वरूप हूँ… परमपिता परमात्मा शिव की संतान हूँ।”
इस धनतेरस एक संकल्प
तो आइए, इस बार घर में नई वस्तु लाने के साथ अपने जीवन में भी एक नया संस्कार लाएं।
मेरा संकल्प है – मैं अपने मन को व्यर्थ और नकारात्मक विचारों से मुक्त रखूँगा। मैं शांति, प्रेम, संतोष और शुभभावना को अपनी वास्तविक संपत्ति बनाउंगा, मैं स्वयं सुखी रहूँगा और अपने व्यवहार, वाणी और संकल्पों से दूसरों को भी सुख और शांति देने का प्रयास करूँगा।
क्यों न इस धनतेरस पर हम यही संकल्प करें-
”घर में धन आए, लेकिन मन में शांति रहे; जीवन में समृद्धि आए, लेकिन साथ में संतोष और शुभभावना भी बढ़े।” यही है सच्ची धनतेरस – भीतरी समृद्धि के दीप जलाएं और दिव्य गुणों की खुशबू फैलाएं।

