जीवन में अनेक बार ऐसा होता है कि जो वस्तु हमारे पास सबसे अधिक मूल्यवान होती है, उसी का मूल्य हम सबसे कम समझते हैं। जब तक उसकी वास्तविक पहचान होती है, तब तक बहुत कुछ हाथ से निकल चुका होता है। इतिहास गवाह है कि अज्ञान केवल ज्ञान का अभाव नहीं, बल्कि अनमोल अवसरों की हानि का कारण भी बन जाता है।
ये सुंदर कहानी इस सत्य को अत्यंत सहजता से समझाती है- एक राजा वन में मार्ग भूल गया। संध्या का समय था। उसे एक वनवासी की छोटी-सी कुटिया दिखाई दी। वनवासी ने बिना किसी परिचय के उसे अतिथि मानकर प्रेमपूर्वक भोजन कराया, जल पिलाया और प्रात: सुरक्षित मार्ग तक पहुँचा दिया। उसकी नि:स्वार्थ सेवा से प्रसन्न होकर राजा ने विदा देते समय उसे उपहार में चंदन का एक उपवन भेंट कर दिया।
वनवासी अत्यंत प्रसन्न हुआ, किंतु वह चंदन के वास्तविक मूल्य से अनभिज्ञ था। उसने चंदन के वृक्ष काटने आरंभ कर दिए और उनकी लकडिय़ों का कोयला बनाकर बेचने लगा। परिवार का निर्वाह होता रहा और उसे यही लगा कि वह उपवन उसके लिए पर्याप्त लाभदायक है।
समय बीतता गया। एक दिन मार्ग में एक चंदन व्यापारी मिला। उसने चंदन के एक छोटे से लट्ठे का मूल्य स्वर्ण मुद्राओं में दिया। उसी क्षण वनवासी की आँखें खुलीं। उसे ज्ञात हुआ कि वह जिस अमूल्य संपदा को वर्षों से कोयले में बदलता रहा, उसका वास्तविक मूल्य तो अकल्पनीय था। परंतु तब तक पूरा चंदन वन काटकर समाप्त कर चुका था। अब उसके पास केवल पश्चाताप था।
क्या यह केवल एक वनवासी की कहानी है? नहीं। यह हमारे अपने जीवन का भी दर्पण है।
परमात्मा ने हमें मनुष्य जीवन दिया – यह स्वयं में एक अनुपम वरदान है। फिर उससे भी बड़ा सौभाग्य तब मिला, जब स्वयं शिव बाबा ने हमें खोजा। उन्होंने आत्मा की पहचान कराई, जीवन का उद्देश्य बताया, दु:खों का कारण समझाया और राजयोग के माध्यम से सर्वशक्तियों का खज़ाना हमारे सामने खोल दिया। उन्होंने बताया कि यह वही संगमयुग है जो पूरे कल्प में केवल एक बार आता है – जब साधारण मनुष्य देवतुल्य बनने की यात्रा पर अग्रसर होता है।
परंतु प्रश्न यह है कि क्या हम इस ईश्वरीय जन्म के वास्तविक मूल्य को पहचान रहे हैं?
बाबा बार-बार स्मृति दिलाते हैं – ”संगमयुग का एक-एक सेकंड वर्षों से भी अधिक मूल्यवान है।” यह समय केवल स्वयं को बदलने का नहीं, बल्कि विश्व परिवर्तन में निमित्त बनने का समय है। यही वह घड़ी है, जब एक संकल्प भी भाग्य की रेखाएं बदल सकता है।
यदि इस स्वर्णिम काल को हमने साधारण समझकर व्यतीत कर दिया, तो अंत में वही स्थिति होगी जो उस वनवासी की हुई। तब आत्मा अनुभव करेगी – परमात्मा ने तो सर्वशक्तियों से सम्पन्न बना दिया था; मैं स्वयं ही उनका पूरा उपयोग नहीं कर पाया।
ब्राह्मण जीवन केवल अपना कल्याण करने का मार्ग नहीं है। यह तो विश्वकल्याण का संकल्प है। हमारे विचारों से किसी को शांति मिले, हमारी वाणी से किसी के मन में आशा जागे, हमारे व्यवहार से किसी का दु:ख हल्का हो और हमारी सेवा से कोई आत्मा परमात्मा तक पहुँच जाए – यही ईश्वरीय जीवन की सार्थकता है।
चंदन की सबसे बड़ी विशेषता उसका मूल्य नहीं, उसकी सुगंध है। वह स्वयं भी महकता है और अपने संपर्क में आने वाली प्रत्येक वस्तु को भी सुगंधित कर देता है। ठीक इसी प्रकार ब्राह्मण जीवन का उद्देश्य केवल स्वयं महान बनना नहीं, बल्कि अपने गुणों, योगबल और सेवा से विश्व को सुगंधित करना है।
आइए,हम स्वयं से एक प्रश्न पूछें – क्या मैं अपने ईश्वरीय जन्म को चंदन की तरह सुगंधित बना रहा हूँ, या अनजाने में उसे कोयले की तरह साधारण बना रहा हूँ?
समय अभी हमारे हाथ में है। यही पुरुषार्थ का समय है, यही सेवा का समय है, और यही भाग्य निर्माण का समय है। आइए, इस अमूल्य संगमयुग को पहचानें, अपने जीवन को गुणों की सुगंध से भर दें और परमात्मा के उस विश्वास को सार्थक करें, जिसके कारण उन्होंने हमें इस महान कार्य के निमित्त बनाया है।


