Homeलेख“सतसंग करने के लिए, कुसंग से बचें” -बी.के.रामसिंह, रेवाड़ी(हरियाणा)

“सतसंग करने के लिए, कुसंग से बचें” -बी.के.रामसिंह, रेवाड़ी(हरियाणा)

प्राचीन काल की बात है, एक अशिक्षित ब्राह्मण क्रूर डाकू बन गया। उसने अपने परिवार के पोषण के लिए यात्रियों की हत्या और लूट का मार्ग अपनाया। एक बार एक संत का डाकू से सामना हो गया। डाकू ने उन्हें लूटने का प्रयास किया। इस पर संत ने कहा:–तुम अपने परिवार के जिन सदस्यों के पोषण के लिए यह पापकर्म करते हो, क्या तुम्हारे पाप में वे परिजन भी भागीदार होना चाहेंगे?

डाकू आश्चर्य चकित था। उससे पहली बार किसी ने ऐसा सवाल किया था। उसने सहमति तो जता दी लेकिन पुष्टि करने के लिए उसने थोड़ा समय मांगा। संत को एक पेड़ से बांधकर, डाकू घर पहुंचा और अपने पिता से वही सवाल पूछा जो संत ने पूछा था। पिता ने उत्तर दिया:– हमने तुम्हें छोटे से बड़ा किया, अब हमारा पोषण करना तुम्हारा कर्तव्य है। तुम कैसे धन लाते हो, हमें इससे कोई सरोकार नहीं है? तुम्हारे पाप में हमारे भागीदार होने का प्रश्न ही नहीं उठाता।

पिता के वचन सुनकर डाकू के पैरों तले जमीन सरक गई। डाकू ने फिर एक-एक कर माता, पत्नी और पुत्र से भी यही प्रश्न किया। सभी ने स्पष्ट मना कर दिया। तब डाकू दौड़ता हुआ संत के पास पहुंचा और उन्हें बंधन मुक्त कर माफी मांगी। संत की प्रेरणा से डाकू ने अपना पाप कर्म छोड़ दिया और भगवान का जाप करने लगा।

संतजन् कहते हैं:- जीवन में सतसंग के अवसर आते रहते हैं। हम यदि उनकी तरफ पीठ कर खड़े हैं तो सतसंग का लाभ नहीं मिल पाता। यदि सतसंग में उतरे तो जीवनभर का पाप भी कुछ पलों में तिरीहित होकर, जीवन की दिशा बदल देता है। जीवन में यदि कुछ पल भी सतसंग के मिलते हैं, तो जिंदगी संवर जाती है। ये कुछ पल पूरे जीवन के पापों को भी दूर कर देते हैं। इसलिए सतसंग करें ना करें परंतु कुसंग कभी नकरें।

वर्तमान का समय व्यावहारिक दौर है अर्थात हमें जीवन में अनेक लोगों से मिलना-जुलना पड़ता है, तब हम यह भी जान जाते हैं कि कौन लोग अच्छे नहीं हैं? परंतु फिर भी इसी व्यवहार की वजह से, उनसे संबंध भी रखने पड़ते हैं। समझदारी इसमें है कि उनसे व्यवहार तो रखें परन्तु कुसंग अधिक लंबे समय तक पकड़ कर न रखें। जिस प्रकार हम वाहन चलाते वक्त सावधानी रखने हैं कि हम किसी से ना टकराये या दूसरा कोई हमसे न टकरा जाए। इसी प्रकार कुसंग के बारे में हमें इससे भी अधिक सावधानी रखने की जरूरत है। बुरे लोगों का संग मीठा जहर है:– जिस तरह के लोगों के साथ हम समय बिताते हैं, वैसे ही हम भी बन जाते हैं अर्थात अच्छी संगत अच्छा भविष्य, बुरी संगत बुरा भविष्य बनाती है। इसमें सबसे ज्यादा मित्र प्रभावित करते हैं। बुरे लोगों का संग मीठा जहर है, जो शुरू में तो बहुत अच्छा लगता है परंतु उनका परिणाम बहुत भयंकर होता है। जिन लोगों को संगति बिगाड़ती है, उनका सुधरना कठिन हो जाता हैं। वह जब भी एक दूसरे के संपर्क में आएंगे, वह वही एक्शन करेंगे जो उन्होंने भूतकाल में कमजोर क्षणों में किए थे।

कुसंग अपना असर दिखाता है:– संगति तय करती है कि आपकी जीवन बेहतर होगी या बदनाम। जिस व्यक्ति को यह पता नहीं कि सही क्या है, गलत क्या है, वह बुरी संगति में फंस जाता है? अगर जिंदगी में कभी अच्छे व्यक्ति का साथ नहीं मिलता है, तो अकेले आगे बढ़े परंतु कुसंग का साथ न करे। उस समय आपको मुश्किले मजबूर जरूर करेंगीं लेकिन कुसंग से बच जाएंगे। मूर्ख व्यक्ति, समझदार व विद्वान लोगों के साथ रहकर विद्वान बन जाता है। बुद्धिमान व्यक्ति यदि मूर्खों के साथ रहेगा, तो वह भी मूर्ख बन जाएगा।

कुसंग पतन का कारण बनता है:– कुसंग से बड़े- बड़ों का पतन हो जाता है। कुसंग से बर्बाद लोगों को देखें तो पाएंगे कि जिन व्यक्तियों के संग वे उठते-बैठते थे, वे हीं उनके पतन का कारण बने। वास्तव में मनुष्य का भविष्य उसकी संगति पर आधारित है। जो व्यक्ति आपको अच्छे लगते हो परंतु उनके साथ कुसंग की बू आती हो, तो तुरंत दूरी बना लेनी चाहिए। वर्तमान समय हमारे अनेक व्यक्तियों से कामकाज में लगाव हो जाते हैं और काफी समय भी उनके साथ बिताना पड़ता है। वे खराब होते हुए भी हमें प्रभावित करते हैं। उन लोगों के मन की गलत व खराब बातें भी बहुत पसंद आती है, इसलिए वह कुसंग की और तुरंत जुड़ जाता है। कुसंग पहले अंदर प्रवेश करता है:– कुसंग का अर्थ यह नहीं कि केवल आचरणहीन मनुष्यो के साथ नहीं रहना अपितु नकारात्मक विचार वालों से भी दूरी बनाकर रखना चाहिए। ऐसे व्यक्तियों से भी दूर रहे, जो अपनी जिंदगी में आलस्य और अलबेलेपन की जिंदगी बिता रहे हो, जैसे लोहा पानी पर नहीं तैर सकता, वैसे ही मूर्ख की संगत से कोई लाभ नहीं मिल सकता है। स्वाति नक्षत्र की बूंद जब केले के पत्ते पर पड़ती है, तो वह कपूर बन जाती है। सीप में पड़ती है तो वह मोती बन जाती है और सांप के मुंह में पड़ती है तो वह विष बन जाती है अर्थात जैसी संगत होती है, वैसी रंगत चढ़ जाती है। संग सदा ऐसे लोगों का करें, जो जीवन में सदा उमंग- उत्साह और दूसरों को ऊंचा उठाने का कार्य करते हो अर्थात अपने जीवन में उत्साहित हो और उनकी हर बात में हिम्मत झलकती हो। अतः आप ऐसे लोगों से तभी जुड़ पाएंगे, जब आप अपने मन को कुसंग से बचा कर रखेंगे क्योंकि कुसंग में बाहरी लोगों की जरूरत नहीं, यह तो अंदर ही अंदर घोर कुसंग का संसार समेट कर रखता है। इसलिए पहले स्वयं को भीतर से बचाए फिर बाहर की तैयारी करें।

सतसंग होता है, ज्ञान मार्ग में:– आज अनेक लोग यह नहीं जानते कि सत का संग किसको कहा जाता है? सतसंग का नाम तो अविनाशी चला आता है, जैसे भक्ति मार्ग में कहते हैं:– हम फलाने-फलाने सतसंग में जाते हैं। सतसंग कोई निमंत्रण नहीं है कि जब बुलाएंगे तभी हम जाएंगे। सतसंग तो मन की प्यास है, जाएगा वही जिसको मन की प्यास लगी होगी अर्थात सत्य की जानकारी रखने वालों का संग, जीवन को ऊंचाइयों की ओर ले जाने वालों का संग। सतसंग खुद को बदलने की सबसे ऊंची प्रक्रिया का नाम है। वास्तव में भक्ति मार्ग में कोई सतसंग में जाते ही नहीं क्योंकि सतसंग होता ही है– ज्ञान मार्ग में, संगमयुग पर आत्माएं सत्य पिता परमात्मा शिव के संग बैठती हैं और कोई जगह आत्माएं परमपिता परमात्मा के संग नहीं बैठती क्योंकि आत्माओं के पिता परमात्मा को पहचानते ही नहीं।

अज्ञान अंधेरा छटता है, सतसंग से:– आज जबकि संसार में अनेक परेशानियां बढ़ती जा रही है तो लोग यह समझने लगे हैं कि आत्मा और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अर्थात समस्याओं का समाधान धैर्य और अध्यात्म के पास ही सबसे सही है, जिसे कह सकते हैं:– सतसंग अर्थात सत का संग करना ही समाधान है। सत्य अर्थात् परमात्मा का संग करके, अनेक जन्मों के पापों से छुटकारा पाया जा सकता है और आगे पाप करने से भी छूटा जा सकता है। कहा जाता है कि मनुष्य जीवन में सतसंग भी बड़े भाग्य से मिलता है। जब सतसंग मिलता है तो अज्ञानता का अंधेरा छटता जाता है और अनेक समस्याओं का निदान निकलता है। यही सतसंग अर्थात् परमात्मा के संग से सुख, शांति, आनंद तक पहुंचाने का रास्ता भी है।

अच्छी संगति बुद्धि को प्रखर बनाती है:– अच्छी संगति और अच्छे विचार व्यक्ति में हिम्मत और सकारात्मक भाव लाती है। समाज के निर्णय में, मनुष्य के निर्माण में अच्छी संगति का योगदान होता है। अच्छी संगति बुद्धि को प्रखर बनाती है और वाणी में मिठास लाती है। अच्छी संगति व्यक्ति को निर्भय बनाती है और प्रेरणा देती है। अच्छी संगति व्यक्ति के जीवन की दिशा बदल देती है। शिवभगवानुवॉच:– परमात्म कथन है कि इस कल्याणकारी संगमयुग पर तुम सभी आत्माओं का संग एक सत्य परमात्मा पिता के साथ है। इसलिए सत्य परमात्मा को निरंतर याद करना है क्योंकि परमात्मा वंडरफुल है, आत्माएं भी वंडरफुल है तो यह दुनिया भी वंडरफुल है। जितना सत का संग करेंगे, आत्मा उतनी ही बलवान बनती जाएगी। आयु भी बड़ी होती है तो काया भी निरोगी होती है। भल कहते हैं, हम सतसंग में जाते हैं परंतु वह देह- अभिमान में आ जाते हैं। लेकिन संगम पर आत्माएं परमात्मा शिव के संग मधुबन में बैठते हैं, इसके अलावा कोई भी मनुष्य सत के संग में बैठ नहीं सकता। सत का संग, इसका यथार्थ रीति अर्थ परमात्मा बैठ समझाते हैं कि तुम आत्माएं, परमात्मा पिता जो सत्य है उसके साथ बैठते हैं परमात्मा पिता ही सत पिता, सत टीचर और सतगुरु है। हम सभी आत्माएं ही सत् के संग में मधुबन में बैठते हैं।

बी.के. रामसिंह ,दिव्य दर्शन भवन, दिल्ली रोड,रेवाड़ी (हरियाणा). मोबाइल 9306963858,9416775971

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