Homeब्र.कु. जगदीशबदलाव की महसूसता आपको बदल देगी

बदलाव की महसूसता आपको बदल देगी

दृष्टि और वृत्ति को न बदला तो कृति नहीं बदलेगी। अगर कृति न बदली तो विकर्मों में धंसता जायेगा। स्मृति-भ्रंश हो जायेगी और जिसकी स्मृति ही भ्रंश हो जाये, तो गीता के महावाक्य हैं कि उसकी केवल लुटिया ही नहीं डूबती, उसका तो सर्वनाश हो जाता है।

कोई पुरूषार्थी सोच सकता है कि ये जो ऊँची-ऊँची बातें हैं, ये उनकी पहुँच से बाहर हैं और अभी तो वे उससे काफी दूर हैं। कोई तो ये भी कहेंगे कि ये आदर्श हैं, ये व्यवहारिक नहीं हैं। वे यह जानना चाहेंगे कि वे ऐसी गगनचुम्बी अवस्था में अथवा स्थिति के शिखर पर कैसे पहुंचें, उनका मन जो बार-बार मैला हो जाता है, उस धूल-मिट्टी अथवा कचड़े-कीचड़ से कैसे बचे रहें? वे कहेंगे कि उनकी दृष्टि पर तो दूसरों के अवगुणों का चश्मा चढ़ा ही रहता है या उनके दुर्गुण उनकी आँख में धूल के कंकड़ की तरह चुभते ही रहते हैं। आखिर उन्हेंआँखें तो खुली रखनी है, तब उनकी दृष्टि कैसे निर्मल बनी रहे? ये प्रश्न हरेक के लिए उपयोगी है। इनके पीछे तब दृष्टि और वृत्ति को बदलने की चेष्टा है। यह चेष्टा संकेत देती है कि उनकी पुरूषार्थ करने की नियत तो है।
ऐसे लोग उन लाखों-करोड़ों से अच्छे हैं जो अपनी दृष्टि-वृत्ति को बदलने की कामना ही नहीं करते। अपनी हालत खराब कर बैठने के बावजूद भी वे इस खराबी के स्वाभाविक होने की बात करते हैं और तर्क-वितर्क से उसे युक्ति-संगत बताते हैं। ऐसे लोगों का बदलना तब तक असम्भव है जब तक उन्हें यह एहसास ही नहीं होता है कि हमें स्वयं को बदलना चाहिए। बदलना आवश्यक है। बदलने के बिना हमारी गति ही नहीं है। आज बदलें या कल, बदलने के बिना कोई दूसरा रास्ता ही नहीं है। मन की गहराई से यदि हम बदलना स्वीकार नहीं करेंगे तो परिस्थितियाँ हमें बदलने पर मजबूर कर देंगी। तब भी यदि हम न बदले तो फिर हम स्वयं को मनुष्य की कोटि में न समझें।
कुत्ता एक ऐसा पशु है जिसकी पूँछ सदा टेढ़ी बनी रहती है। कहते हैं कि एक मनुष्य ने वर्षभर कुत्ते की पूँछ को लोहे की नली में सीधा कसकर रखा। उसने सोचा एक वर्ष काफी होता है,अब तो यह पूँछ सीधी हो गयी होगी। इस दौरान कुत्ता चिल्लाता भी था तो भी उसने उसकी पूँछ पर से नली नहीं हटायी। पर वर्षभर बाद जब हटायी तब वो यह देखकर आश्चर्य चकित हुआ कि कुत्ते की पूँछ वैसी की वैसी टेढ़ी है! ऐसे ही कुछ लोग बदलना ही नहीं चाहते। उनके बारे में तो कहेंगे कि क्रअल्लाह खैर करे, खुदा हाफिज़, उन्हें खौफे खुदा ही नहीं हैञ्ज, जो धर्मराज से ही नहीं डरते वे धर्मात्माओं से कहाँ डरेंगे!

अब छोड़ो व्यर्थ बातें सुनने और दूसरों के दुर्गुण देखने की आदत को

जो बदलना चाहे, उनके लिए कल्याणकारी प्रभु ने अनेक विधियाँ, युक्तियाँ अथवा उपाय बताये हैं जिनसे उनकी आत्मा में घुसे हुए संस्कार बाहर निकल जायें और उनका पीछा छोड़ दें। उन सबका तो यहाँ उल्लेख करना सम्भव नहीं है परन्तु एक ऐसी बात को यहाँ हम लिपिबद्ध करना चाहेंगे जोकि किसी अंश में हमारी दृष्टि-वृत्ति को विकृत होने से बचा सकती है। वो यह है कि कई बार हम किसी व्यक्ति से किसी दूसरे की निन्दा सुनकर, चुगली सुनकर, शिकायत सुनकर, अफवाह सुनकर उसे तुरन्त मान जाते हैं और यह सोचने लगते हैं, ”अच्छा, वो व्यक्ति ऐसा निकृष्ट है! हमने तो उसके विषय में कभी ऐसा सोचा भी नहीं था।” हम उस बात की जाँच नहीं करते। बल्कि यह देखकर कि कहने वाला व्यक्ति हमारा घनिष्ठ मित्र है, विश्वासपात्र है, हमारे निकटतम है, हम उस बात को दूसरे व्यक्ति की अनुपस्थिति में मान जाते हैं। गोया हम उसकी पीठ में छुरा घोंपते हैं। चाहे वो व्यक्ति निर्दोष ही हो, हम दूसरे के कहने में आकर मन ही मन उससे घृणा करने लगते हैं। जिसे हम अच्छा समझते थे, उसे अब घटिया मानने लगते हैं और कई बार तो दूसरों को कहने लगते हैं कि ”अरे, तुम्हें मालूम है कि उस व्यक्ति का तो फलाँ से लगाव-झुकाव है, वो झूठा है, ठग है, बेईमान है, वो केवल बाहर का दिखावा दिखाता है और वाचाल(बोलने में होशियार) है, बाकी उसमें ज्ञान-ध्यान कुछ नहीं है।” तुम आगे से उससे बोलना छोड़ दो, उसका संग खराब है। मनुष्य कमर के साथ भारी पत्थर बांधकर पानी में उतरेगा तो डूबेगा ही।
उसके संग वाले का भी ऐसा ही परिणाम होगा। सुना, तुम बचकर रहना।ञ्जञ्ज जब ऐसी दृष्टि-वृत्ति हो जाये तो मनुष्य की अपनी बुद्धि मारी जाती है क्योंकि वो स्वयं अपनी बुद्धि में कंकड़-पत्थर इकट्ठे करने लगता है गोया अपनी ही डूबने की तैयारी करने लगता है। अपने को जि़न्दा जलाने के लिए अपनी चिता की लकडिय़ाँ स्वयं चुनकर लाता है और उनकी सेज बनाता है। अपनी हत्या के लिए अग्नि स्वयं अपने हाथ से जगाता है। उसे किसी करनीघोर ब्राह्मण की आवश्यकता ही नहीं। शमशान पर जलाने की रस्म करने वाले जो पंडित होते हैं, उनकी भी उसे आवश्यकता ही नहीं। वो बिना मंत्र और रस्म के मर जाता है। किसी को उसका जनाज़ा उठाने की भी ज़रूरत नहीं क्योंकि वह तो अपने आप ही चिता पर लेट जाता है। हाय, हम अपने जीवन से यह क्या करते हैं! जैसे कोई चन्दन को जलाकर कोयला बना ले, वैसे ही हम अपने जीवन को भस्म कर देते हैं। अब छोड़ो दुश्मनी को, उसके लिए छोड़ो नफरत को, नफरत को छोडऩे के लिए छोड़ो दूसरों की व्यर्थ बातें सुनने को और दूसरों के दुर्गुणों को देखने की आदत को। अगर यह एक बात भी हम पक्की कर लें तो भी हम उस रास्ते पर चल पड़ेंगे और खुशी,आनन्द तथा मित्रभाव के झूले में झूलते रहेंगे। दृष्टि और वृत्ति को न बदला तो कृति नहीं बदलेगी। अगर कृति न बदली तो विकर्मों में धंसता जायेगा। स्मृति-भ्रंश हो जायेगी और जिसकी स्मृति ही भ्रंश हो जाये, तो गीता के महावाक्य हैं कि उसकी केवल लुटिया ही नहीं डूबती, उसका तो सर्वनाश हो जाता है।

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